प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) के तहत रसोई गैस का लाभ लेने वाले करोड़ों परिवारों के लिए केंद्र सरकार ने एक अहम बदलाव किया है। सरकार ने सब्सिडी वाले एलपीजी सिलेंडरों की वार्षिक संख्या में बड़ी कटौती करने का फैसला लिया है। अब योजना के पात्र लाभार्थियों को पूरे वर्ष में केवल चार एलपीजी सिलेंडरों पर ही सब्सिडी का फायदा मिलेगा। इससे पहले यह सीमा नौ सिलेंडर थी। सरकार का कहना है कि यह फैसला लाभार्थियों की वास्तविक खपत और बढ़ते वित्तीय बोझ को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
सोमवार को आयोजित एक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव प्रवीण मल खनूजा ने इस बदलाव की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सरकार लगातार एलपीजी पर भारी सब्सिडी दे रही है, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे में सब्सिडी व्यवस्था को अधिक व्यावहारिक और टिकाऊ बनाने के लिए यह कदम उठाया गया है।
उज्ज्वला योजना की शुरुआत मई 2016 में की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य गरीब और ग्रामीण परिवारों को पारंपरिक ईंधनों जैसे लकड़ी, कोयला और गोबर के उपलों से मुक्ति दिलाकर स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराना था। योजना के शुरुआती चरण में लाभार्थियों को एक साल में 12 सब्सिडी वाले 14.2 किलोग्राम एलपीजी सिलेंडर प्राप्त करने की सुविधा दी गई थी। हालांकि समय के साथ इस संख्या में बदलाव होते रहे। पहले इसे घटाकर नौ सिलेंडर किया गया और अब नई व्यवस्था के तहत केवल चार सिलेंडरों तक ही सब्सिडी सीमित कर दी गई है।
सरकार का दावा है कि यह निर्णय किसी मनमानी के आधार पर नहीं लिया गया है, बल्कि वास्तविक आंकड़ों के अध्ययन के बाद लिया गया है। अधिकारियों के अनुसार अधिकांश उज्ज्वला लाभार्थी सालभर में औसतन चार से पांच सिलेंडर ही इस्तेमाल करते हैं। इसलिए सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या को वास्तविक खपत के करीब लाने का प्रयास किया गया है।
एलपीजी को आम लोगों के लिए सस्ता और सुलभ बनाए रखने के उद्देश्य से सरकार ने मई 2022 में विशेष सब्सिडी योजना शुरू की थी। इसके तहत उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को प्रत्येक 14.2 किलोग्राम सिलेंडर पर 200 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाने लगी थी। यह राशि सीधे लाभार्थियों के बैंक खाते में ट्रांसफर की जाती थी। बाद में अक्टूबर 2023 में इस सहायता को बढ़ाकर 300 रुपये प्रति सिलेंडर कर दिया गया। पांच किलोग्राम वाले छोटे सिलेंडरों पर भी इसी अनुपात में सब्सिडी का लाभ दिया जाता है।
सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या में यह कमी ऐसे समय की गई है जब एलपीजी की खुदरा कीमतों में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पिछले तीन महीनों के दौरान घरेलू गैस सिलेंडर के दाम दो बार बढ़ाए गए हैं। हालिया संशोधन के बाद 14.2 किलोग्राम वाले सिलेंडर की कीमत 942 रुपये तक पहुंच गई है। हालांकि उज्ज्वला लाभार्थियों को 300 रुपये की सब्सिडी मिलने के बाद प्रभावी कीमत लगभग 642 रुपये पड़ती है।
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि उपभोक्ताओं को मिलने वाली यह राहत वास्तविक रूप से काफी बड़ी है। उनके मुताबिक एलपीजी सिलेंडर की आपूर्ति पर सरकार की अनुमानित लागत लगभग 1,600 रुपये प्रति सिलेंडर तक पहुंच गई है। इसके मुकाबले लाभार्थियों से ली जाने वाली राशि काफी कम है, जिससे प्रति सिलेंडर लगभग 1,000 रुपये के बराबर अप्रत्यक्ष सहायता मिल रही है।
7 जून को घरेलू गैस की कीमतों में 29 रुपये प्रति सिलेंडर की नई बढ़ोतरी की गई थी। सरकार का तर्क है कि यह वृद्धि देखने में बड़ी लग सकती है, लेकिन दैनिक खर्च के हिसाब से इसका प्रभाव सीमित है। अधिकारियों के अनुसार यह बढ़ोतरी प्रति दिन लगभग एक रुपये के बराबर बैठती है। यदि पांच सदस्यों वाले परिवार को आधार माना जाए तो प्रति व्यक्ति इसका अतिरिक्त बोझ प्रतिदिन करीब 20 पैसे के आसपास आता है।
एलपीजी की कीमतों पर सबसे अधिक प्रभाव अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव का पड़ता है। हाल के महीनों में मध्य पूर्व क्षेत्र में बढ़ते तनाव और आपूर्ति संबंधी चुनौतियों के कारण वैश्विक स्तर पर एलपीजी की कीमतों में तेज उछाल आया है। सरकार का कहना है कि इसके बावजूद भारत में घरेलू गैस की कीमतें दुनिया के कई देशों की तुलना में अब भी कम बनी हुई हैं।
अधिकारियों के मुताबिक फरवरी के अंत से पश्चिम एशिया में उत्पन्न भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने ऊर्जा बाजार पर गहरा असर डाला है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ी अनिश्चितता के कारण खाड़ी देशों से एलपीजी की सप्लाई प्रभावित हुई है। इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर पड़ा है और वैश्विक बाजार में एलपीजी महंगी हुई है।
भारत अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में एलपीजी का आयात करता है। आयात लागत का निर्धारण मुख्य रूप से सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस (Saudi CP) के आधार पर होता है, जिसे इस ईंधन का प्रमुख वैश्विक मानक माना जाता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार फरवरी के बाद से इस बेंचमार्क कीमत में करीब 46 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इसी कारण घरेलू स्तर पर गैस उपलब्ध कराने की लागत भी काफी बढ़ गई है।
सरकार का कहना है कि बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कीमतों के बावजूद उपभोक्ताओं पर पूरा बोझ नहीं डाला गया है। इसके बजाय सरकार ने सब्सिडी और अन्य वित्तीय सहायता के माध्यम से उपभोक्ताओं को राहत देने की कोशिश की है। यही वजह है कि वास्तविक लागत और उपभोक्ता मूल्य के बीच अभी भी बड़ा अंतर बना हुआ है।
पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2022 से अब तक एलपीजी सब्सिडी के रूप में लगभग 52,000 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। यह राशि बताती है कि सरकार पर सब्सिडी का वित्तीय दबाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में सब्सिडी वितरण को अधिक लक्षित और प्रभावी बनाने के लिए नए बदलाव लागू किए जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या कम होने से उन परिवारों पर असर पड़ सकता है जिनकी गैस खपत औसत से अधिक है। हालांकि सरकार का कहना है कि अधिकांश लाभार्थियों की जरूरतें चार सब्सिडी वाले सिलेंडरों से पूरी हो जाती हैं और नई सीमा वास्तविक उपभोग के अनुरूप ही तय की गई है।
फिलहाल यह फैसला उज्ज्वला योजना के करोड़ों लाभार्थियों के लिए महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है। एक ओर सरकार बढ़ती लागत और सब्सिडी खर्च को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर उपभोक्ताओं के लिए रसोई गैस की बढ़ती कीमतें चिंता का विषय बनी हुई हैं। आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति और घरेलू नीतियों के आधार पर एलपीजी कीमतों तथा सब्सिडी व्यवस्था में और बदलाव देखने को मिल सकते हैं।




