अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव के बीच आज पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद एक अहम कूटनीतिक केंद्र बन गया है। दोनों देशों के शीर्ष प्रतिनिधि यहां आमने-सामने बैठकर उन मुद्दों पर चर्चा करने वाले हैं, जिनका असर सिर्फ इन दो देशों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ सकता है।
शुक्रवार देर रात ईरान का 71 सदस्यीय उच्च-स्तरीय डेलिगेशन इस्लामाबाद पहुंचा। ईरान की सरकारी एजेंसी तसनीम के मुताबिक, यह प्रतिनिधिमंडल सिर्फ बातचीत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें रणनीतिक सलाहकार, सुरक्षा विशेषज्ञ, मीडिया प्रतिनिधि और अनुभवी राजनयिक भी शामिल हैं। इस टीम की अगुवाई ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ कर रहे हैं, जिन्हें देश के प्रमुख नीति-निर्माताओं में गिना जाता है।
ईरानी डेलिगेशन के पहुंचने के कुछ ही समय बाद यह स्पष्ट हो गया कि आज की बातचीत महज औपचारिक नहीं होगी, बल्कि कई जटिल और संवेदनशील मुद्दों पर सीधी टक्कर देखने को मिल सकती है। उधर, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ आज इस्लामाबाद पहुंचने वाले हैं। उनके आगमन के साथ ही दोनों पक्षों के बीच आधिकारिक वार्ता शुरू होगी। अमेरिका की ओर से यह संकेत दिए गए हैं कि वह इस बातचीत को निर्णायक दिशा देना चाहता है।
हालांकि बातचीत से पहले ही माहौल कुछ हद तक तनावपूर्ण नजर आ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को लेकर सख्त बयान देते हुए कहा कि ईरान के पास अब सीमित विकल्प बचे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ईरान समुद्री मार्गों पर दबाव बनाकर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। ट्रम्प ने यह भी कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो अमेरिका फिर से सख्त कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। ट्रम्प के इस बयान को कूटनीतिक दबाव की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिससे बातचीत से पहले ही ईरान पर मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाई जा सके।
दूसरी तरफ, इस्लामाबाद पहुंचने के बाद ईरान के शीर्ष वार्ताकार गालिबाफ ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उनका देश बातचीत के लिए तैयार है और शांति की उम्मीद रखता है, लेकिन अमेरिका पर भरोसा करना उनके लिए आसान नहीं है। उन्होंने साफ कहा कि अतीत में हुए समझौते अक्सर टूटे हैं, इसलिए इस बार ईरान सतर्क रुख अपनाएगा। गालिबाफ ने यह भी संकेत दिया कि अगर अमेरिका ईमानदारी से समझौते की दिशा में आगे बढ़ता है, तो ईरान भी सकारात्मक कदम उठा सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी समझौते में ईरान के हितों से समझौता नहीं किया जाएगा।
आज की इस वार्ता में सबसे बड़ा और विवादित मुद्दा ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को पूरी तरह सीमित करे या बंद करे, साथ ही अपने उच्च स्तर के संवर्धित यूरेनियम को देश से बाहर भेजे। इसके विपरीत, ईरान इसे अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा मानता है।
एक और बड़ा मुद्दा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण मार्ग है। दुनिया का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से तेल और गैस की आपूर्ति करता है। ईरान इस क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता है और कथित तौर पर यहां से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाने की बात कर रहा है। वहीं, अमेरिका का स्पष्ट रुख है कि यह मार्ग पूरी तरह खुला और बिना किसी बाधा के रहना चाहिए।
इसके अलावा, ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम भी बातचीत का अहम हिस्सा है। अमेरिका इस पर सख्त नियंत्रण चाहता है, क्योंकि उसका मानना है कि इससे क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा को खतरा हो सकता है। ईरान इसे अपनी रक्षा नीति का जरूरी हिस्सा बताता है।
आर्थिक मोर्चे पर भी दोनों देशों के बीच बड़ा टकराव है। ईरान की मांग है कि उस पर लगे सभी अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध तुरंत हटाए जाएं, उसके फंसे हुए अरबों डॉलर के एसेट्स वापस किए जाएं और उसे हुए नुकसान की भरपाई की जाए। वहीं, अमेरिका इन मांगों को शर्तों के साथ जोड़कर देख रहा है। इन सभी जटिल मुद्दों के बीच आज की बातचीत को बेहद अहम माना जा रहा है। यह तय करेगा कि आने वाले समय में अमेरिका और ईरान के रिश्ते किस दिशा में जाएंगे, क्या दोनों देश किसी समझौते तक पहुंच पाएंगे या फिर तनाव और गहराएगा।
दुनिया भर के कूटनीतिक और आर्थिक विश्लेषक इस वार्ता पर नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि इसका असर न केवल मध्य पूर्व, बल्कि वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजारों पर भी पड़ सकता है।




