ईरान में सत्ता परिवर्तन की हलचल: मोजतबा खामेनेई बने अगले सर्वोच्च नेता – रिपोर्ट

ईरान में सत्ता परिवर्तन की हलचल: मोजतबा खामेनेई बने अगले सर्वोच्च नेता – रिपोर्ट

ईरान की राजनीति में बड़ा उलटफेर सामने आया है। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स ने अयातुल्ला अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई को ईरान का नया सर्वोच्च नेता चुन लिया है। यह फैसला ऐसे वक्त में लिया गया, जब देश अमेरिका और इज़रायल के साथ युद्ध जैसे हालात से गुजर रहा था।

युद्ध, मौत और जल्दबाज़ी में लिया गया फैसला

बताया जा रहा है कि अली खामेनेई के निधन के बाद 3 मार्च 2026 को यह चयन किया गया। लगातार हवाई हमलों और सुरक्षा खतरे के चलते असेंबली की आमने-सामने बैठक नहीं हो सकी। इसके बजाय, सदस्यों ने ऑनलाइन बैठक कर नया नेता चुनने की प्रक्रिया पूरी की। UK स्थित मीडिया संस्थान Iran International ने सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि इस पूरे घटनाक्रम में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) की भूमिका निर्णायक रही।

कौन हैं मोजतबा खामेनेई?

करीब 56 वर्षीय मोजतबा खामेनेई सार्वजनिक राजनीति में कम दिखते रहे हैं, लेकिन सत्ता के गलियारों में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है। वे औपचारिक रूप से बड़े धार्मिक पद पर नहीं हैं, फिर भी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और बसिज जैसे ताकतवर संगठनों से उनके करीबी रिश्ते बताए जाते हैं। यही संबंध उन्हें सत्ता के केंद्र तक ले आए।

क्यों उठ रहे हैं सवाल?

इस फैसले पर विवाद इसलिए भी गहरा है क्योंकि 1979 की इस्लामिक क्रांति का उद्देश्य राजशाही और वंशानुगत शासन को खत्म करना था। ऐसे में पिता के बाद बेटे का सर्वोच्च पद पर आना कई धार्मिक और राजनीतिक हलकों में क्रांति के मूल विचारों से टकराव के रूप में देखा जा रहा है।

IRGC की भूमिका पर चर्चा

सूत्रों का कहना है कि रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने असेंबली के सदस्यों पर दबाव डाला कि मौजूदा युद्ध हालात में किसी “भरोसेमंद” और “कठोर रुख” वाले व्यक्ति को ही चुना जाए। हार्डलाइन गुटों का मानना था कि मोजतबा इस भूमिका के लिए सबसे उपयुक्त हैं। वहीं, आलोचकों का तर्क है कि इस तरह का चयन भविष्य में आंतरिक अस्थिरता को जन्म दे सकता है।

आगे की राह कितनी मुश्किल?

मोजतबा खामेनेई के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी वैधता स्थापित करने की होगी। उनके पास अपने पिता जैसा धार्मिक कद नहीं है, जिससे उन्हें शासन चलाने के लिए सुरक्षा बलों पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी इस फैसले की आलोचना होने की संभावना जताई जा रही है, जहां इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया से हटकर वंशवादी कदम बताया जा सकता है। युद्ध की आग और नए नेतृत्व की परीक्षा, ईरान फिलहाल दोहरे संकट के दौर में प्रवेश कर चुका है।