चैत्र नवरात्रि का सातवां दिन देवी शक्ति के उग्र लेकिन कल्याणकारी स्वरूप मां कालरात्रि को समर्पित होता है। इस दिन भक्त विशेष भक्ति और श्रद्धा के साथ मां की पूजा करते हैं। मान्यता है कि मां कालरात्रि की उपासना करने से जीवन में व्याप्त डर, बाधाएं और नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है और साहस का संचार होता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब दैत्य शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में उत्पात मचाया, तब मां दुर्गा ने कालरात्रि का रूप धारण किया। रक्तबीज के शरीर से गिरने वाली हर बूंद से नया राक्षस पैदा हो जाता था, लेकिन मां कालरात्रि ने अपनी शक्ति से उसका अंत किया। उन्होंने युद्ध के दौरान रक्त को धरती पर गिरने से पहले ही अपने भीतर समेट लिया, जिससे बुराई का नाश संभव हुआ।
मां कालरात्रि का स्वरूप अत्यंत प्रभावशाली और रहस्यमयी माना जाता है। उनका रंग काला है, बाल खुले रहते हैं और उनके तीन नेत्र तेजस्विता का प्रतीक हैं। गले में विद्युत के समान चमकती माला और उनका उग्र रूप देखने में भले ही भयावह लगे, लेकिन वे अपने भक्तों के लिए सुरक्षा कवच के समान हैं। इसलिए उन्हें “शुभंकारी” भी कहा जाता है।
पूजा की शुरुआत प्रातःकाल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर करनी चाहिए। पूजा स्थल को शुद्ध कर मां की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके बाद कुमकुम, अक्षत, फूल, धूप और दीप अर्पित करें। इस दिन पूजा में दिखावे से अधिक सच्ची भावना और भक्ति को महत्व दिया जाता है।
भोग के रूप में मां कालरात्रि को गुड़ और चने अर्पित करना शुभ माना जाता है। पूजा के बाद इस प्रसाद को परिवार में बांटने से सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। अंत में मां की आरती करना अत्यंत आवश्यक माना गया है।
मां कालरात्रि के बीज मंत्र “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः” का जाप इस दिन विशेष फलदायी होता है। इससे मन को शांति मिलती है और नकारात्मक विचारों से मुक्ति मिलती है। साथ ही इस दिन नीले रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना गया है, जो आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।
कुल मिलाकर, नवरात्रि का यह दिन हमें यह संदेश देता है कि साहस, आस्था और सही निर्णय से जीवन की हर कठिनाई पर विजय प्राप्त की जा सकती है।




