स्मार्टफोन, इंटरनेट और ऑनलाइन गेमिंग का बढ़ता इस्तेमाल अब भारत में एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में सामने आ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों और बड़ों दोनों में चिड़चिड़ापन, बेचैनी, नींद की कमी और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याओं को बढ़ा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले एक दशक में देश में डिजिटल उपयोग तेजी से बढ़ा है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार वर्ष 2014 में जहां इंटरनेट कनेक्शन लगभग 25 करोड़ थे, वहीं 2024 तक यह संख्या बढ़कर करीब 97 करोड़ हो गई है और वर्तमान में यह आंकड़ा 100 करोड़ से भी अधिक आंका जा रहा है। देश के 85 प्रतिशत से अधिक घरों में कम से कम एक स्मार्टफोन मौजूद है।
विशेष रूप से 15 से 24 वर्ष के किशोरों और युवाओं में इंटरनेट मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग की लत तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक डिजिटल उपयोग के कारण पढ़ाई और काम में ध्यान कम होना, तनाव बढ़ना और नींद की समस्या आम होती जा रही है।
चिकित्सकों के अनुसार मोबाइल और अन्य डिजिटल स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी शरीर में बनने वाले Melatonin हार्मोन के स्राव को प्रभावित करती है, जिससे रात में नींद आने में देरी होती है और नींद की गुणवत्ता खराब हो जाती है। इसके अलावा आंखों में जलन, गर्दन और पीठ दर्द, मोटापा तथा हृदय संबंधी जोखिम भी बढ़ सकते हैं।
विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि बच्चों और युवाओं में ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए, स्क्रीन टाइम सीमित रखा जाए और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से सलाह ली जाए। उनका कहना है कि यदि समय रहते डिजिटल आदतों पर नियंत्रण नहीं किया गया तो भविष्य में यह मानसिक स्वास्थ्य के बड़े संकट का रूप ले सकता है।
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