ईरान मुद्दे पर अमेरिका को झटका, ब्रिटेन ने सैन्य सहयोग से खींचे हाथ

ईरान मुद्दे पर अमेरिका को झटका, ब्रिटेन ने सैन्य सहयोग से खींचे हाथ

ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई को लेकर अमेरिका को अपने करीबी सहयोगी ब्रिटेन से बड़ा झटका लगा है। ब्रिटिश मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूनाइटेड किंगडम ने साफ कर दिया है कि वह ईरान पर किसी भी तरह के हमले के लिए अपने सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देगा। इस फैसले ने दोनों देशों के बीच कूटनीतिक असहजता बढ़ा दी है।

ब्रिटिश ठिकानों पर अमेरिका की एंट्री बंद

रिपोर्ट में बताया गया है कि पहले से मौजूद समझौतों के तहत अमेरिकी सैन्य विमानों को ग्लॉस्टरशायर स्थित RAF फेयरफोर्ड और हिंद महासागर में मौजूद डिएगो गार्सिया बेस से ऑपरेशन के लिए ब्रिटिश सरकार की पूर्व मंजूरी जरूरी होती है। मौजूदा हालात में ब्रिटेन ने ईरान के खिलाफ किसी भी संभावित कार्रवाई के लिए ऐसी मंजूरी देने से इनकार कर दिया है। ब्रिटिश पक्ष का कहना है कि बिना ठोस कानूनी आधार के सैन्य हस्तक्षेप अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ हो सकता है।

वॉशिंगटन में नाराज़गी, ट्रंप का तीखा हमला

ब्रिटेन के इस रुख पर अमेरिका में नाराज़गी खुलकर सामने आई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने न सिर्फ इस फैसले की आलोचना की, बल्कि 2025 में हुए उस समझौते को भी निशाने पर लिया जिसमें डिएगो गार्सिया और चागोस द्वीपसमूह से जुड़ी संप्रभुता को मॉरिशस को सौंपने की बात कही गई थी। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि संभावित खतरे को रोकने के लिए अमेरिका को इन अहम एयरफील्ड्स की जरूरत पड़ सकती है।

चागोस डील से जुड़ा तनाव

मामला तब और गरमा गया जब ट्रंप और ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर के बीच ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत हुई। इसके बाद ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से चागोस डील पर सवाल उठाते हुए संकेत दिया कि अगर भविष्य में कोई सैन्य कदम उठाया गया, तो उसमें ब्रिटेन की भूमिका अहम हो सकती है। उन्होंने यह भी दावा किया कि ईरान से यूके और उसके सहयोगियों को खतरा हो सकता है, ऐसे में समर्थन अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में आएगा। कुल मिलाकर, ईरान को लेकर अमेरिका और ब्रिटेन के बीच तालमेल में आई यह दरार वैश्विक राजनीति में नई बहस को जन्म दे रही है।