मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि पाकिस्तान अमेरिका और सऊदी अरब के समर्थन में ईरान के खिलाफ चल रहे संघर्ष में शामिल हो सकता है। अगर ऐसा होता है तो क्षेत्रीय समीकरण बदल सकते हैं और भारत के लिए भी नई चुनौतियां पैदा हो सकती हैं, खासकर ईरान के चाबहार बंदरगाह को लेकर।
दरअसल भारत कई वर्षों से चाबहार पोर्ट के विकास में निवेश कर रहा है। इस परियोजना को पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के विकल्प के रूप में देखा जाता है। इसी रास्ते भारत अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक व्यापार बढ़ाने की योजना बना रहा है। ऐसे में विश्लेषकों का मानना है कि यदि पाकिस्तान ईरान के खिलाफ किसी सैन्य कार्रवाई में शामिल होता है, तो वह इसी बहाने चाबहार बंदरगाह को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर सकता है।
कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि पाकिस्तान के पास इस संघर्ष में उतरने के रणनीतिक कारण हो सकते हैं। अमेरिका के साथ फिर से करीबी बढ़ाकर वह खुद को क्षेत्र में वॉशिंगटन का प्रमुख सहयोगी साबित करना चाहता है। इससे उसे सैन्य मदद, आधुनिक हथियार और कूटनीतिक समर्थन मिलने की उम्मीद हो सकती है। इसके अलावा अफगानिस्तान भी पाकिस्तान की रणनीति का अहम हिस्सा हो सकता है। माना जा रहा है कि अगर अमेरिका के साथ उसकी साझेदारी मजबूत होती है, तो वह अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ कार्रवाई के लिए अमेरिकी सहयोग मांग सकता है। इसके लिए बगराम एयरबेस पर अमेरिकी सैनिकों की वापसी की भी चर्चा हो रही है।
दूसरी ओर, पाकिस्तान पर सऊदी अरब के साथ हुए रक्षा समझौतों का भी दबाव बताया जा रहा है। ईरान की ओर से सऊदी अरब पर लगातार हमलों के बाद इस समझौते को सक्रिय करने की संभावना की चर्चा हो रही है। पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार ने भी हाल ही में ईरान को इस रक्षा समझौते की याद दिलाई थी। हालांकि फिलहाल यह सब कयासों के स्तर पर है, लेकिन यदि पाकिस्तान इस संघर्ष में शामिल होता है तो इसका असर पूरे क्षेत्र की राजनीति और सुरक्षा पर पड़ सकता है, जिसमें भारत के हित भी सीधे तौर पर प्रभावित हो सकते हैं।




