रिश्तों की संवेदनशीलता और पारिवारिक जिम्मेदारियों पर सवाल उठाता हुआ एक मार्मिक मामला अमृतसर के कोट खालसा से सामने आया है। यहां एक बुजुर्ग पिता को उनके ही बेटे और बहू ने करीब डेढ़ साल पहले घर से निकाल दिया था। तब बेटियों ने पिता की सेवा की। अंतिम संस्कार में बेटे की गैरहाजिरी में धार्मिक क्रिया भी बेटियों ने निभाई। यह घटना कोट खालसा में एक बुजुर्ग की है, जिसने अपना पूरा जीवन लगाकर बेटे-बेटियों को अपने पैरों पर खड़ा किया। बीमारी और अकेलेपन में जीवन गुजारने के बाद जब उनका निधन हुआ तो बेटे की गैरहाजिरी में दो बेटियों ने अपने पिता को अंतिम विदाई दी और चिता को अग्नि दी। यह दृश्य समाज की पारंपरिक मान्यताओं से अलग था, लेकिन साथ ही एक गहरी पीड़ा और जिम्मेदार रिश्तों की अनदेखी की गवाही भी दे रहा था। लंबे समय से बीमार थे पिता बताया गया कि बुजुर्ग की पत्नी की पहले ही मौत हो चुकी थी। वह लंबे समय से बीमार थे। बेटियों और लोगों की मानें तो बेटा और बहू पिता की कोई सेवा नहीं करते थे। इतना ही नहीं, बेटियां जब जाती थीं, उनसे ठीक व्यवहार नहीं करते थे। करीब डेढ़ साल पहले जब पिता की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई तो दोनों ने उन्हें घर से निकाल दिया। ऐसे में बेटियां सहारा बनीं और उन्हें अपने पास रखा। बेटियों ने निभाया अंतिम फर्ज मृतक की बेटी वीणा ने बताया, “हमने डेढ़ साल तक पिता की सेवा की। वे रोज अपने बेटे को याद करते थे। कई बार फोन किया, लेकिन भाई ने एक बार भी हाल नहीं पूछा, न ही कोई जवाब दिया।” वीणा के अनुसार, “जब भी हम बहनें पिता से मिलने उनके घर जातीं, हमारी भाभी हमें दरवाजे से ही टका सा जवाब दे देती थीं, घर के अंदर तक नहीं आने देती थीं।” भाभी घर के अंदर तक नहीं आने देती थीं “अब जब वो दुनिया से चले गए, तो हमने ही उन्हें अग्नि दी, यही हमारा धर्म था।” दूसरी बेटी संगीता ने भी कहा कि पिता ने जीवन भर अपने बेटे के लिए सब कुछ किया, लेकिन अंत में बेटियां ही उनके साथ खड़ी रहीं। भाई ने कभी पिता की हालचाल तक नहीं पूछी। बेटा न फोन पर आया, न अंतिम संस्कार में स्थानीय निवासियों ने बताया कि बुजुर्ग व्यक्ति की तबीयत लंबे समय से खराब चल रही थी, लेकिन बेटे ने न तो उन्हें घर में रखा और न ही एक बार हाल चाल लेने आया। परिजनों के अनुसार, मृतक ने कई बार बेटे से संपर्क करने की कोशिश की, पर हर बार निराशा ही हाथ लगी। समाज के लिए चेतावनी बेटी ने कहा, “यह मामला केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि समाज के लिए एक गहरी चेतावनी भी है कि कैसे आधुनिक जीवनशैली और पारिवारिक कलह की वजह से बुजुर्ग उपेक्षित हो रहे हैं।” परंपरा के अनुसार बेटा अंतिम संस्कार करता है, लेकिन यहां बेटियों ने वो अधिकार निभाया जिसे निभाना उनका कर्तव्य भी था और प्यार भी। स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया स्थानीय निवासी हरभजन सिंह ने कहा, “हमने कभी नहीं सोचा था कि बेटियां वो काम करेंगी जो बेटे को करना चाहिए था। यह समाज के लिए शर्म की बात है कि बुजुर्ग को उनके अपने ही बेटा बेसहारा छोड़ दें।” रिश्तों की संवेदनशीलता और पारिवारिक जिम्मेदारियों पर सवाल उठाता हुआ एक मार्मिक मामला अमृतसर के कोट खालसा से सामने आया है। यहां एक बुजुर्ग पिता को उनके ही बेटे और बहू ने करीब डेढ़ साल पहले घर से निकाल दिया था। तब बेटियों ने पिता की सेवा की। अंतिम संस्कार में बेटे की गैरहाजिरी में धार्मिक क्रिया भी बेटियों ने निभाई। यह घटना कोट खालसा में एक बुजुर्ग की है, जिसने अपना पूरा जीवन लगाकर बेटे-बेटियों को अपने पैरों पर खड़ा किया। बीमारी और अकेलेपन में जीवन गुजारने के बाद जब उनका निधन हुआ तो बेटे की गैरहाजिरी में दो बेटियों ने अपने पिता को अंतिम विदाई दी और चिता को अग्नि दी। यह दृश्य समाज की पारंपरिक मान्यताओं से अलग था, लेकिन साथ ही एक गहरी पीड़ा और जिम्मेदार रिश्तों की अनदेखी की गवाही भी दे रहा था। लंबे समय से बीमार थे पिता बताया गया कि बुजुर्ग की पत्नी की पहले ही मौत हो चुकी थी। वह लंबे समय से बीमार थे। बेटियों और लोगों की मानें तो बेटा और बहू पिता की कोई सेवा नहीं करते थे। इतना ही नहीं, बेटियां जब जाती थीं, उनसे ठीक व्यवहार नहीं करते थे। करीब डेढ़ साल पहले जब पिता की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई तो दोनों ने उन्हें घर से निकाल दिया। ऐसे में बेटियां सहारा बनीं और उन्हें अपने पास रखा। बेटियों ने निभाया अंतिम फर्ज मृतक की बेटी वीणा ने बताया, “हमने डेढ़ साल तक पिता की सेवा की। वे रोज अपने बेटे को याद करते थे। कई बार फोन किया, लेकिन भाई ने एक बार भी हाल नहीं पूछा, न ही कोई जवाब दिया।” वीणा के अनुसार, “जब भी हम बहनें पिता से मिलने उनके घर जातीं, हमारी भाभी हमें दरवाजे से ही टका सा जवाब दे देती थीं, घर के अंदर तक नहीं आने देती थीं।” भाभी घर के अंदर तक नहीं आने देती थीं “अब जब वो दुनिया से चले गए, तो हमने ही उन्हें अग्नि दी, यही हमारा धर्म था।” दूसरी बेटी संगीता ने भी कहा कि पिता ने जीवन भर अपने बेटे के लिए सब कुछ किया, लेकिन अंत में बेटियां ही उनके साथ खड़ी रहीं। भाई ने कभी पिता की हालचाल तक नहीं पूछी। बेटा न फोन पर आया, न अंतिम संस्कार में स्थानीय निवासियों ने बताया कि बुजुर्ग व्यक्ति की तबीयत लंबे समय से खराब चल रही थी, लेकिन बेटे ने न तो उन्हें घर में रखा और न ही एक बार हाल चाल लेने आया। परिजनों के अनुसार, मृतक ने कई बार बेटे से संपर्क करने की कोशिश की, पर हर बार निराशा ही हाथ लगी। समाज के लिए चेतावनी बेटी ने कहा, “यह मामला केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि समाज के लिए एक गहरी चेतावनी भी है कि कैसे आधुनिक जीवनशैली और पारिवारिक कलह की वजह से बुजुर्ग उपेक्षित हो रहे हैं।” परंपरा के अनुसार बेटा अंतिम संस्कार करता है, लेकिन यहां बेटियों ने वो अधिकार निभाया जिसे निभाना उनका कर्तव्य भी था और प्यार भी। स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया स्थानीय निवासी हरभजन सिंह ने कहा, “हमने कभी नहीं सोचा था कि बेटियां वो काम करेंगी जो बेटे को करना चाहिए था। यह समाज के लिए शर्म की बात है कि बुजुर्ग को उनके अपने ही बेटा बेसहारा छोड़ दें।” पंजाब | दैनिक भास्कर
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