चुनाव से पहले बांग्लादेश में तनाव चरम पर, अल्पसंख्यक समुदायों में डर का माहौल

चुनाव से पहले बांग्लादेश में तनाव चरम पर, अल्पसंख्यक समुदायों में डर का माहौल

बांग्लादेश में आम चुनाव अब बस कुछ ही दिन दूर हैं, लेकिन मतदान से पहले देश का माहौल लगातार अस्थिर होता जा रहा है। सत्तापरिवर्तन के बाद राजनीतिक खींचतान तेज़ हुई है और इसके साथ ही हिंसा की घटनाओं में भी इज़ाफ़ा देखा जा रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, मौजूदा हालात का सबसे ज़्यादा असर धार्मिक अल्पसंख्यकों पर पड़ रहा है, जो खुद को पहले से कहीं अधिक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

राजनीतिक मोर्चे पर इस बार मुकाबला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ है। चुनावी सरगर्मी के बीच अलग-अलग दलों के समर्थकों के बीच झड़पों की खबरें सामने आई हैं। इन्हीं परिस्थितियों में कट्टरपंथी तत्वों की सक्रियता बढ़ने की बात भी कही जा रही है।

फॉरगॉटन मिशनरीज इंटरनेशनल (FMI) से जुड़े ब्रूस एलन ने देश की स्थिति पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक माहौल अनिश्चितता से भरा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली कार्यवाहक सरकार के कार्यकाल में उग्रता के प्रति नरमी देखी गई है, जिससे गुस्सा, उत्पीड़न और महंगाई जैसी समस्याएं और गहराती गई हैं। एलन के शब्दों में, “स्थिति पूरी तरह से बेकाबू होती जा रही है।”

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि युवाओं, खासकर जेनरेशन ज़ेड से जुड़े राजनीतिक आंदोलनों में अब पहले जैसी एकजुटता नहीं रही। छात्र-नेतृत्व वाला नेशनल सिटिजन पार्टी का जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन भी विवादों के घेरे में बताया गया है, जिसने चुनाव से पहले राजनीतिक समीकरणों को और जटिल बना दिया है।

धार्मिक अल्पसंख्यकों—जैसे हिंदू, ईसाई और बौद्ध समुदाय—के लिए हालात और ज़्यादा चिंताजनक बताए गए हैं। ब्रूस एलन के मुताबिक, बढ़ती अराजकता का फायदा उठाकर कट्टरपंथी समूह अधिक सक्रिय हो गए हैं। इससे धार्मिक स्थलों के निर्माण और समुदायों की गतिविधियों पर खतरा मंडरा रहा है।

रिपोर्ट में एक स्थानीय पादरी ‘मिंटू’ का उदाहरण दिया गया है, जिनके चर्च निर्माण की योजना को पड़ोस में विरोध के कारण रोकना पड़ा। बताया गया है कि पिछले करीब डेढ़ साल से निर्माण कार्य पूरी तरह ठप है। इसके अलावा, कई ईसाई परिवार ऐसे भूखंडों पर रहते हैं जिनका कानूनी स्वामित्व उनके पास नहीं है, जिससे जबरन बेदखली का डर हमेशा बना रहता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मुस्लिम बहुसंख्यक समाज के पास सत्ता और संसाधनों का अधिक नियंत्रण होने के कारण अल्पसंख्यक समुदायों के साथ संबंध बेहद नाज़ुक बने हुए हैं। ऐसे में चुनावी नतीजों से पहले और बाद की स्थिति पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।