दक्षिणी ईरान के मिनाब शहर से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहरी हलचल पैदा कर दी है। यहां एक प्राथमिक विद्यालय पर हुए कथित हवाई हमले में 165 स्कूली बच्चियों की जान जाने का दावा किया गया है। जब इन मासूमों के जनाजे निकाले गए, तो ताबूतों की कतारें देखकर इलाके में गम और गुस्से का माहौल फैल गया।
कब्रों की कतारों ने दिखाई जंग की भयावहता
इस घटना से जुड़ी एक तस्वीर सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें खुली जमीन पर सफेद निशानों से बनी लंबी-लंबी कब्रें नजर आ रही हैं। बताया जा रहा है कि ये कब्रें उसी हमले में मारी गई बच्चियों के लिए खोदी गईं। तस्वीर में लोग सामूहिक अंतिम संस्कार की तैयारियों में खामोशी से खड़े दिखते हैं, जो हालिया संघर्षों में आम नागरिकों पर पड़ने वाले असर की भयावह तस्वीर पेश करता है।
ईरानी अधिकारियों के दावे, पुष्टि बाकी
ईरान के सरकारी सूत्रों का कहना है कि इस हमले में 165 छात्राओं की मौत हुई, जबकि 96 अन्य घायल हैं। हालांकि, इन आंकड़ों की स्वतंत्र एजेंसियों ने अभी पुष्टि नहीं की है। दूसरी ओर, इज़रायल ने मिनाब इलाके में किसी भी सैन्य कार्रवाई से साफ इनकार किया है। अमेरिकी सेना ने भी बयान जारी कर कहा है कि नागरिक हताहतों की खबरों की समीक्षा की जा रही है, लेकिन फिलहाल किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा गया है।
विदेश मंत्री की पोस्ट से उठा वैश्विक सवाल
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस घटना से जुड़ी तस्वीर साझा कर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचा। उन्होंने दावा किया कि स्कूल पर हुई कथित अमेरिकी-इज़राइली बमबारी में बच्चियों के शव बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गए। उनकी पोस्ट में गाजा से लेकर मिनाब तक नागरिकों की मौतों का जिक्र करते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी गई।
“छोटी परियों की छोटी कब्रें”
ईरानी अधिकारी और राजनयिक इस तस्वीर को नागरिक पीड़ा के प्रतीक के तौर पर पेश कर रहे हैं। भारत में ईरान के दूतावास ने भी इसे साझा करते हुए इसे “छोटी परियों की छोटी कब्रें” बताया। इसके बाद यह मामला केवल एक सैन्य घटना न रहकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।
मलबे में जारी राहत-बचाव
हमले के बाद के सत्यापित वीडियो में तबाह स्कूल परिसर दिखाई देता है। राहत और बचाव दल टूटे हुए कंक्रीट के बीच बच्चों के बैग और किताबें निकालते नजर आ रहे हैं। भारी मशीनों की मदद से मलबा हटाया जा रहा है, ताकि किसी संभावित जीवित व्यक्ति को खोजा जा सके। यह घटना एक बार फिर सवाल खड़े करती है कि शहरी इलाकों में होने वाले हमलों की कीमत आखिर आम नागरिकों, खासकर बच्चों को क्यों चुकानी पड़ती है।




