तमिलनाडु के मदुरै की एक अदालत ने छह साल पुराने बहुचर्चित मामले में 9 पुलिसकर्मियों को मृत्युदंड सुनाया है। यह मामला 2020 में कोविड नियमों के कथित उल्लंघन के दौरान एक व्यापारी पिता-पुत्र की पुलिस हिरासत में हुई मौत से जुड़ा है। पी. जयराज और उनके बेटे बेनिक्स को पुलिस द्वारा थाने में बेरहमी से पीटने के आरोप लगे थे, जिसके बाद उनकी हालत बिगड़ी और अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई। अदालत के इस फैसले के बाद देशभर में मृत्युदंड को लेकर बहस फिर तेज हो गई है।
क्या होता है मृत्युदंड?
भारतीय न्याय प्रणाली में मृत्युदंड (Death Penalty) को सबसे कठोर सजा माना जाता है। हालांकि भारत में यह सजा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन इसे केवल बेहद गंभीर और असाधारण मामलों में ही दिया जाता है।
किन मामलों में दी जाती है फांसी?
भारत में मृत्युदंड का प्रावधान मुख्य रूप से भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत है, जिसे पहले IPC कहा जाता था। जघन्य हत्या, देश के खिलाफ युद्ध छेड़ना, आतंकवादी गतिविधियां और बच्चों के साथ अत्यंत गंभीर यौन अपराध जैसे मामलों में यह सजा दी जा सकती है। इसके अलावा कुछ विशेष कानूनों जैसे UAPA और POCSO में भी मृत्युदंड का प्रावधान मौजूद है।
‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ का सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने 1980 के बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले में स्पष्ट किया कि हर हत्या के मामले में फांसी नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि यह सजा केवल उन्हीं मामलों में दी जानी चाहिए, जहां अपराध इतना क्रूर और असाधारण हो कि समाज को झकझोर दे और अपराधी के सुधार की कोई संभावना न हो।
फांसी तक पहुंचने की पूरी कानूनी प्रक्रिया
भारत में किसी को फांसी देना एक लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही संभव होता है।
- सबसे पहले सेशन कोर्ट सजा सुनाती है
- इसके बाद हाई कोर्ट द्वारा सजा की पुष्टि अनिवार्य होती है
- दोषी को सुप्रीम कोर्ट में अपील का अधिकार मिलता है
- पुनर्विचार याचिका और क्यूरेटिव पिटीशन भी दायर की जा सकती है
- अंत में राष्ट्रपति (अनुच्छेद 72) और राज्यपाल (अनुच्छेद 161) के पास दया याचिका का विकल्प होता है
जब तक इन सभी चरणों की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक फांसी लागू नहीं की जाती।
संविधान क्या कहता है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। लेकिन यह भी स्पष्ट करता है कि कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही किसी व्यक्ति को जीवन से वंचित किया जा सकता है। इसी कारण मृत्युदंड के मामलों में हर स्तर पर सावधानी बरती जाती है।
फांसी कैसे दी जाती है?
भारत में फांसी आमतौर पर सूर्योदय से पहले दी जाती है। जेल नियमों के अनुसार उस समय जेल अधीक्षक, मजिस्ट्रेट और मेडिकल अधिकारी की उपस्थिति जरूरी होती है। दोषी को फंदे पर लटकाया जाता है और डॉक्टर द्वारा मृत्यु की पुष्टि होने तक प्रक्रिया जारी रहती है।
भारत में फांसी का इतिहास
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई क्रांतिकारियों को फांसी दी गई, जिनमें मंगल पांडेय, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और खुदीराम बोस जैसे नाम शामिल हैं। आजादी के बाद 9 सितंबर 1947 को जबलपुर जेल में रघुराज सिंह को फांसी दी गई थी। महात्मा गांधी की हत्या के दोषी नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को 1949 में मृत्युदंड दिया गया।
अब तक कितनों को दी गई फांसी?
नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (NLU) की रिपोर्ट के मुताबिक, आजादी के बाद भारत में 1400 से ज्यादा लोगों को फांसी दी जा चुकी है। चर्चित मामलों में रंगा-बिल्ला, अजमल कसाब, अफजल गुरु, याकूब मेमन और निर्भया कांड के दोषी शामिल हैं।
जारी है बहस
भारत में मृत्युदंड को लेकर लगातार बहस होती रही है। मानवाधिकार संगठन इसे खत्म करने की मांग करते हैं, जबकि कई कानून विशेषज्ञों का मानना है कि जघन्य अपराधों पर रोक लगाने के लिए यह सजा जरूरी है। मदुरै कोर्ट का हालिया फैसला एक बार फिर इस मुद्दे को केंद्र में ले आया है, जहां न्याय और मानवाधिकार के बीच संतुलन को लेकर चर्चा जारी है।




