बच्चों के साथ दुष्कर्म से जुड़े मामलों में सजा तय करने के लिए पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़ित की उम्र जितनी कम होगी, अपराध की गंभीरता उतनी अधिक मानी जाएगी और उसी के अनुसार सजा भी सख्त होनी चाहिए। साथ ही, यदि अपराध में एक से अधिक आरोपी शामिल हों, तो दंड और कठोर किया जाएगा।
यह फैसला लुधियाना की एक दर्दनाक घटना के संदर्भ में आया, जहां चार साल से कम उम्र की बच्ची के साथ दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी। इस मामले में आरोपी को पहले ट्रायल कोर्ट द्वारा फांसी की सजा दी गई थी, जिसे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई।
जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने कहा कि देश में पोक्सो मामलों में सजा तय करने के लिए कोई एकसमान दिशा-निर्देश नहीं हैं, जिससे विभिन्न मामलों में अलग-अलग फैसले देखने को मिलते हैं। इस असमानता को दूर करने के लिए अदालत ने नया मानक तैयार किया।
अदालत के अनुसार, सजा निर्धारित करते समय सहमति की कानूनी उम्र को आधार बनाया जाएगा। पीड़ित की उम्र इस सीमा से जितनी कम होगी, सजा उतनी ही बढ़ाई जाएगी। इसी तरह, अपराध में शामिल आरोपियों की संख्या बढ़ने पर भी सजा में वृद्धि की जाएगी।
मामले में अदालत ने दोषी की सजा को बरकरार रखा, लेकिन मौत की सजा को बदलते हुए उम्रकैद में परिवर्तित कर दिया। दुष्कर्म के लिए 25 साल का कठोर कारावास तय किया गया, जबकि हत्या के लिए ऐसी आजीवन कारावास दी गई जिसमें कम से कम 50 साल तक बिना किसी रियायत के जेल में रहना होगा।
कोर्ट ने यह भी माना कि हत्या पहले से योजना बनाकर नहीं की गई थी, बल्कि अपराध के सबूत छिपाने की कोशिश में घबराहट के चलते की गई। इसी कारण इसे “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” श्रेणी में नहीं रखा गया और मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदला गया।



