भारत सितंबर 2026 में एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में रहने वाला है, जब नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन का आयोजन होगा। इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन के शामिल होने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। क्रेमलिन के सूत्रों और प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव के अनुसार, पुतिन इस समिट में भाग लेने के लिए “निश्चित रूप से” भारत आ सकते हैं।
अगर यह दौरा होता है, तो यह एक साल से भी कम समय में पुतिन की दूसरी भारत यात्रा होगी। इससे पहले दिसंबर 2025 में उन्होंने भारत का दौरा किया था, जहां उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ वार्षिक द्विपक्षीय शिखर वार्ता में हिस्सा लिया था। ऐसे में उनकी प्रस्तावित यात्रा को दोनों देशों के रिश्तों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।
भारत इस साल BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और इस बार सम्मेलन की थीम “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” तय की गई है। यह थीम मौजूदा वैश्विक चुनौतियों जैसे आर्थिक अस्थिरता, ऊर्जा संकट, जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीतिक तनाव के बीच सहयोग और टिकाऊ विकास को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। सम्मेलन के 12 और 13 सितंबर को आयोजित होने की संभावना है, जिसमें सदस्य देशों के शीर्ष नेता शामिल होंगे।
यह चौथी बार होगा जब भारत BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। इससे पहले 2012, 2016 और 2021 में भी भारत इस मंच की मेजबानी कर चुका है। इस बार का आयोजन और भी खास माना जा रहा है, क्योंकि BRICS समूह का दायरा अब पहले से ज्यादा व्यापक हो गया है और इसमें नए सदस्य भी शामिल हुए हैं।
BRICS में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देश शामिल हैं। यह मंच न केवल आर्थिक सहयोग और व्यापार बढ़ाने का माध्यम है, बल्कि वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार, बहुपक्षीय संस्थाओं में संतुलन और विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने का भी महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म है।
पुतिन की संभावित भारत यात्रा को भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी के लिए एक बड़ा अवसर माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष और तकनीकी क्षेत्रों में लंबे समय से सहयोग रहा है। हाल के वर्षों में यह संबंध और मजबूत हुए हैं, खासकर बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच।
विशेषज्ञों का मानना है कि BRICS समिट में पुतिन की मौजूदगी से न केवल द्विपक्षीय रिश्तों को नई दिशा मिलेगी, बल्कि ग्लोबल साउथ की आवाज को भी मजबूती मिलेगी। यह मंच उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एकजुट होकर वैश्विक मुद्दों पर अपनी बात रखने का अवसर देता है।
कुल मिलाकर, सितंबर में होने वाला यह शिखर सम्मेलन न सिर्फ कूटनीतिक दृष्टि से अहम होगा, बल्कि यह दुनिया में बदलते शक्ति संतुलन और सहयोग की नई संभावनाओं को भी उजागर करेगा।




