समंदर के नीचे बिछे केबल से घर तक पहुंचता इंटरनेट, जानिए भारत में कैसे होता है डेटा का पूरा सफर

समंदर के नीचे बिछे केबल से घर तक पहुंचता इंटरनेट, जानिए भारत में कैसे होता है डेटा का पूरा सफर

आज की दुनिया में इंटरनेट के बिना जीवन की कल्पना करना लगभग असंभव हो गया है। सुबह उठते ही हम मोबाइल स्क्रीन पर नजर डालते हैं और रात तक सोशल मीडिया, वीडियो स्ट्रीमिंग, ऑनलाइन ट्रांजैक्शन और दफ्तर के कामों में जुड़े रहते हैं। किसी भी सवाल का जवाब पाना हो या किसी से तुरंत संपर्क करना हो, इंटरनेट ने हर काम को आसान और तेज बना दिया है। लेकिन जिस इंटरनेट पर हमारी जिंदगी इतनी निर्भर है, वह आखिर हमारे फोन तक पहुंचता कैसे है, यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है।

बहुत से लोग सोचते हैं कि इंटरनेट सैटेलाइट या हवा में मौजूद किसी अदृश्य सिग्नल के जरिए सीधे हमारे मोबाइल तक पहुंचता है। हालांकि, सच्चाई यह है कि इंटरनेट का ज्यादातर हिस्सा जमीन या समुद्र के नीचे बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबलों पर निर्भर करता है। ये केबल हजारों किलोमीटर लंबी होती हैं और महाद्वीपों को आपस में जोड़ती हैं। इन केबलों के अंदर डेटा प्रकाश (लाइट) के रूप में यात्रा करता है, जिससे जानकारी बेहद तेज गति से एक देश से दूसरे देश तक पहुंचती है।

जब आप अपने फोन पर कोई वेबसाइट खोलते हैं, कोई वीडियो देखते हैं या सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं, तो आपका डेटा सीधे आपके मोबाइल से हवा में नहीं जाता। पहले यह आपके नजदीकी मोबाइल टावर या ब्रॉडबैंड नेटवर्क तक पहुंचता है, फिर वहां से राष्ट्रीय नेटवर्क के जरिए अंतरराष्ट्रीय फाइबर केबलों तक जाता है। इसके बाद यह डेटा उन सर्वरों तक पहुंचता है, जहां वह जानकारी मौजूद होती है। सर्वर से जवाब आने के बाद वही डेटा वापस उसी रास्ते से आपके डिवाइस तक पहुंचता है। यह पूरी प्रक्रिया इतनी तेजी से होती है कि हमें इसका एहसास तक नहीं होता।

भारत में इंटरनेट की शुरुआत भी एक दिलचस्प कहानी है। आम जनता के लिए इंटरनेट सेवा की शुरुआत 15 अगस्त 1995 को हुई थी, जब विदेश संचार निगम लिमिटेड (VSNL) ने इसे लॉन्च किया। हालांकि, इससे पहले भी देश में इंटरनेट का उपयोग होता था, लेकिन वह केवल शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों तक सीमित था। उस समय इंटरनेट बेहद धीमा और सीमित था, जबकि आज यह लगभग हर व्यक्ति के हाथ में मौजूद है।

अब बात करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट भारत में प्रवेश कहां से करता है। दरअसल, दुनिया के अलग-अलग देशों को जोड़ने वाली समुद्री फाइबर-ऑप्टिक केबलें भारत के तटीय इलाकों तक आती हैं। जहां ये केबल समुद्र से निकलकर जमीन से जुड़ती हैं, उन जगहों को “केबल लैंडिंग स्टेशन” कहा जाता है। भारत में ऐसे कई प्रमुख केबल लैंडिंग स्टेशन मौजूद हैं, जिनमें मुंबई, चेन्नई, कोच्चि, तूतीकोरिन और तिरुवनंतपुरम (त्रिवेंद्रम) जैसे शहर शामिल हैं। ये शहर इंटरनेट के मुख्य प्रवेश द्वार की तरह काम करते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में करीब 17 अंतरराष्ट्रीय सबमरीन केबलें जुड़ी हुई हैं, जो देश को वैश्विक इंटरनेट नेटवर्क से कनेक्ट करती हैं। इन केबलों के जरिए आने वाला डेटा पहले इन लैंडिंग स्टेशनों पर पहुंचता है और फिर देशभर में फैले नेटवर्क के माध्यम से अलग-अलग राज्यों, शहरों और गांवों तक पहुंचाया जाता है।

भारत को एशिया, यूरोप और मिडिल ईस्ट से जोड़ने के लिए कई बड़े केबल सिस्टम काम करते हैं। इनमें SEA-ME-WE-4, SEA-ME-WE-5, I-ME-WE और Falcon जैसे प्रमुख नेटवर्क शामिल हैं। ये हाई-स्पीड केबल सिस्टम भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत कनेक्टिविटी प्रदान करते हैं, जिससे हम विदेशी वेबसाइट्स, क्लाउड सेवाओं और ऐप्स का उपयोग आसानी से कर पाते हैं।

देश के भीतर इंटरनेट ट्रैफिक को संभालना भी एक बड़ी चुनौती होती है। इसके लिए बड़े-बड़े डेटा सेंटर, नेटवर्क एक्सचेंज और इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (ISP) मिलकर काम करते हैं। जब अंतरराष्ट्रीय केबल से डेटा भारत में आता है, तो उसे अलग-अलग नेटवर्क हब्स और डेटा सेंटर्स के जरिए रूट किया जाता है। फिर यह डेटा मोबाइल कंपनियों और ब्रॉडबैंड सेवाओं के माध्यम से यूजर्स तक पहुंचता है। इस पूरे सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया गया है कि लाखों-करोड़ों यूजर्स एक साथ इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकें और स्पीड पर ज्यादा असर न पड़े।

अगर यूजर्स की बात करें, तो भारत दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट बाजारों में से एक बन चुका है। 2025 तक देश में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या लगभग 95 करोड़ तक पहुंच गई है। राज्यों में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है, जहां करीब 13 करोड़ से अधिक लोग इंटरनेट का उपयोग करते हैं। इसके अलावा महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे राज्य भी तेजी से डिजिटल हो रहे हैं।

स्पष्ट है कि इंटरनेट कोई जादुई चीज नहीं, बल्कि एक बेहद जटिल और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर का परिणाम है। समुद्र के नीचे बिछी केबलों से लेकर आपके हाथ में मौजूद मोबाइल तक, हर स्तर पर तकनीक का एक बड़ा नेटवर्क काम करता है। यही वजह है कि आज हम दुनिया के किसी भी कोने से कुछ ही सेकंड में जुड़ पाते हैं और डिजिटल दुनिया का हिस्सा बनते हैं।