इस वर्ष 19 अप्रैल, रविवार को अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर पूरे देश में भगवान परशुराम जयंती धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाई जा रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को जन्मे भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। उनका जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के घर हुआ था, जहां उन्होंने बचपन से ही ज्ञान और युद्ध-कौशल दोनों में अद्भुत दक्षता हासिल की।
अवतार का उद्देश्य: जब बढ़ा अधर्म, तब हुआ प्रकट रूप
त्रेतायुग में जब पृथ्वी पर अन्याय और अत्याचार बढ़ने लगे, विशेषकर कुछ क्षत्रिय राजा अपने अहंकार में निर्दोषों और ऋषि-मुनियों पर अत्याचार करने लगे, तब धर्म की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने परशुराम के रूप में अवतार लिया। उनका लक्ष्य था ऐसे अत्याचारी शासकों का अंत कर समाज में संतुलन स्थापित करना।
कार्तवीर्य अर्जुन का अंत और न्याय की स्थापना
पौराणिक कथाओं के अनुसार, हैहय वंश के राजा कार्तवीर्य अर्जुन ने अपनी शक्ति के घमंड में आकर ऋषि जमदग्नि का अपमान किया और उनकी कामधेनु को छीन लिया। इस अन्याय के विरोध में भगवान परशुराम ने युद्ध कर सहस्रार्जुन का वध किया और पृथ्वी को उसके आतंक से मुक्त कराया।
कैसे मिला ‘परशुराम’ नाम और शिवजी का आशीर्वाद
भगवान परशुराम की कठोर तपस्या और अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें एक दिव्य फरसा प्रदान किया। इसी कारण उनका नाम ‘परशुराम’ पड़ा। साथ ही उन्हें अजेयता और चिरंजीवी होने का वरदान भी मिला। वे शस्त्र और शास्त्र दोनों के अद्वितीय ज्ञाता माने जाते हैं।
सिर्फ योद्धा नहीं, समाज सुधारक भी थे परशुराम
भगवान परशुराम ने केवल अधर्म के खिलाफ युद्ध ही नहीं किया, बल्कि समाज को प्रकृति और कृषि से जोड़ने का संदेश भी दिया। उन्होंने सिखाया कि शक्ति का उपयोग हमेशा कमजोरों की रक्षा और न्याय के लिए होना चाहिए।
परशुराम जयंती का धार्मिक महत्व
अक्षय तृतीया के दिन किए गए दान-पुण्य और पूजा का फल कभी समाप्त नहीं होता, ऐसी मान्यता है। इस दिन भगवान परशुराम की पूजा करने से साहस, ज्ञान और विजय का आशीर्वाद मिलता है। देशभर में मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और शोभायात्राएं आयोजित की जाती हैं, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।




