आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जैसे ही रविवार आता है, लोगों को राहत का एहसास होने लगता है। हफ्तेभर की थकान के बाद यह दिन आराम, परिवार और अपने लिए समय निकालने का मौका देता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर सप्ताह में सिर्फ रविवार को ही छुट्टी क्यों दी जाती है?
इस सवाल का जवाब इतिहास, धर्म और सामाजिक बदलावों में छिपा हुआ है। शुरुआत धार्मिक मान्यताओं से होती है। ईसाई धर्म के अनुसार भगवान ने छह दिनों में सृष्टि की रचना की और सातवें दिन विश्राम किया। इस सातवें दिन को ‘सब्बाथ’ कहा गया और इसे पूजा व आराम के लिए समर्पित किया गया। शुरुआती दौर में कुछ समुदाय शनिवार को विश्राम का दिन मानते थे, लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव आया।
चौथी शताब्दी में यह मान्यता मजबूत हुई कि इसी दिन ईसा मसीह का पुनरुत्थान हुआ था। इसके बाद रविवार को पवित्र दिन के रूप में स्वीकार कर लिया गया। यहीं से इस दिन को खास महत्व मिलने लगा।
इतिहास में बड़ा मोड़ तब आया जब 321 ईस्वी में रोमन सम्राट कॉन्स्टेंटाइन द ग्रेट ने रविवार को आधिकारिक अवकाश घोषित कर दिया। उनके आदेश के तहत इस दिन सरकारी कामकाज और व्यापार बंद रखने की व्यवस्था की गई। उन्होंने इसे ‘सूर्य का दिन’ यानी Sunday नाम दिया, जो आगे चलकर पूरी दुनिया में प्रचलित हो गया।
इसके बाद यूरोप में ईसाई धर्म के विस्तार के साथ रविवार को ‘गॉड डे’ यानी भगवान का दिन माना जाने लगा। चर्च में प्रार्थना और धार्मिक गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए इस दिन छुट्टी की परंपरा और मजबूत होती चली गई।
औद्योगिक क्रांति के समय भी रविवार की छुट्टी का महत्व बढ़ा। उस दौर में मजदूरों से लगातार काम लिया जाता था, जिससे वे मानसिक और शारीरिक रूप से थकने लगे। ब्रिटेन में मजदूर आंदोलनों के बाद रविवार को पूर्ण अवकाश और शनिवार को आधे दिन की छुट्टी लागू की गई।
ब्रिटिश शासन के प्रभाव से यह व्यवस्था दुनिया के कई देशों तक पहुंची, जिसमें भारत भी शामिल था। धीरे-धीरे रविवार को साप्ताहिक अवकाश के रूप में वैश्विक मान्यता मिल गई।
इस तरह रविवार की छुट्टी सिर्फ आराम का दिन नहीं, बल्कि धर्म, इतिहास और सामाजिक संघर्षों का मिला-जुला परिणाम है, जो आज हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है।




