हिमाचल में पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों ने राजनीतिक माहौल पूरी तरह गर्मा दिया है। जिला परिषद चुनाव भले ही पार्टी चिन्ह पर नहीं लड़े जाते, लेकिन राजनीतिक दलों ने इसे प्रतिष्ठा और भविष्य की ताकत से जोड़ लिया है। एक ओर भाजपा ने प्रदेशभर में अपने समर्थित जिला परिषद प्रत्याशियों की सूची जारी कर खुलकर चुनावी मैदान में उतरने का संकेत दिया है, वहीं सत्तारूढ़ कांग्रेस ने आधिकारिक उम्मीदवार घोषित न करने की रणनीति अपनाई है। हालांकि जमीनी स्तर पर कांग्रेस विधायक अपने-अपने क्षेत्रों में करीबी नेताओं को समर्थन देकर चुनावी समीकरण साधने में जुट गए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंचायत चुनाव इस बार केवल स्थानीय निकायों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इन्हें आने वाले विधानसभा चुनावों का “सेमीफाइनल” माना जा रहा है। यही कारण है कि दोनों प्रमुख दल गांव स्तर तक अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं।
कांग्रेस की ‘ऑफिशियल दूरी’, लेकिन अंदरखाने सक्रियता तेज
कांग्रेस नेतृत्व ने स्पष्ट किया है कि पार्टी आधिकारिक तौर पर जिला परिषद प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारेगी। यह फैसला पिछले महीने हुई प्रदेश कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में लिया गया था। मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने स्वयं घोषणा की थी कि पार्टी सीधे तौर पर उम्मीदवार घोषित नहीं करेगी। बाद में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने भी इस नीति की पुष्टि की।
हालांकि, राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस ने भले ही संगठनात्मक स्तर पर दूरी बनाई हो, लेकिन कई विधायक अपने समर्थकों को खुला समर्थन दे रहे हैं। सोलन जिला के दून विधानसभा क्षेत्र, ऊना जिला के चिंतपूर्णी और कुटलैहड़ क्षेत्रों में कांग्रेस नेताओं ने अपने करीबी उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार भी शुरू कर दिया है। कई स्थानों पर स्थानीय स्तर पर पोस्टर और बैठकों के जरिए समर्थित उम्मीदवारों को “कांग्रेस विचारधारा का प्रतिनिधि” बताया जा रहा है।
भाजपा ने पहले ही तय कर लिया संगठनात्मक ढांचा
भाजपा ने इस बार भी पिछली रणनीति दोहराते हुए अधिकृत समर्थित प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी है। पार्टी का उद्देश्य चुनाव के बाद जिला परिषद अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चयन में किसी तरह की अंदरूनी खींचतान से बचना माना जा रहा है।
दरअसल, जिला परिषद चुनावों के बाद चुने गए सदस्यों में से अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव होता है। इन पदों को स्थानीय राजनीति में काफी प्रभावशाली माना जाता है, क्योंकि इनके पास प्रशासनिक अधिकारों के साथ सरकारी सुविधाएं और संसाधनों पर भी प्रभाव होता है। ऐसे में राजनीतिक दल पहले से ही अपने समर्थकों का बहुमत सुनिश्चित करने की कोशिश में जुटे हैं।
गांव की राजनीति में बढ़ी प्रतिस्पर्धा
प्रधान, उपप्रधान, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य के चुनाव भले ही गैर-दलीय आधार पर होते हों, लेकिन गांवों में राजनीतिक ध्रुवीकरण साफ दिखाई देने लगा है। मंत्री, विधायक और बड़े नेता अपने-अपने क्षेत्रों में अधिक से अधिक समर्थक उम्मीदवार जिताने के लिए रणनीति बना रहे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों, सरकारी योजनाओं और राजनीतिक पहुंच को लेकर इन चुनावों का महत्व काफी बढ़ गया है। पंचायत प्रतिनिधियों के जरिए ही कई योजनाओं का क्रियान्वयन होता है, इसलिए राजनीतिक दल इन्हें जमीनी नेटवर्क मजबूत करने का सबसे बड़ा माध्यम मान रहे हैं।
संगठनात्मक बैठकों और समीकरणों का दौर तेज
भाजपा लगातार संगठनात्मक बैठकें कर रही है और जिला स्तर पर चुनावी रणनीति को अंतिम रूप दिया जा रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस के भीतर भी आंतरिक स्तर पर समीकरण साधने की कवायद जारी है। पार्टी के कई नेता चाहते हैं कि संगठन से जुड़े और सक्रिय कार्यकर्ताओं को आगे लाया जाए, ताकि भविष्य में विधानसभा चुनावों के लिए मजबूत आधार तैयार हो सके।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पंचायत चुनावों के नतीजे आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। यही वजह है कि भले ही चुनाव चिह्न न हों, लेकिन मुकाबला पूरी तरह राजनीतिक रंग ले चुका है।

