हरियाणा में गेहूं खरीद को लेकर सियासत तेज हो गई है। इंडियन नेशनल लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष अभय चौटाला ने राज्य सरकार और खरीद एजेंसियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि इस बार गेहूं खरीद प्रक्रिया में बड़े स्तर पर अनियमितताएं हुई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश से सस्ते दामों पर गेहूं खरीदकर उसे हरियाणा की मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर बेचा गया, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ है।
अभय चौटाला ने कहा कि उत्तर प्रदेश के किसानों से 600 से 800 रुपये प्रति क्विंटल कम कीमत पर गेहूं खरीदा गया और बाद में उसे हरियाणा की मंडियों में एमएसपी के तहत दिखाकर बेचा गया। उनके मुताबिक इस पूरे मामले में करीब 2000 करोड़ रुपये से अधिक का घोटाला हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया में कुछ बिचौलियों और अधिकारियों की मिलीभगत हो सकती है।
इनेलो नेता ने सरकार के उस दावे पर भी सवाल उठाए, जिसमें किसानों को 72 घंटे के भीतर फसल भुगतान करने की बात कही गई थी। उन्होंने कहा कि जमीनी स्थिति इससे बिल्कुल अलग है और बड़ी संख्या में किसानों को अभी तक उनकी फसल का पूरा भुगतान नहीं मिला है। अभय चौटाला के अनुसार करीब 30 प्रतिशत किसानों का भुगतान अब भी लंबित है, जिससे किसानों में भारी नाराजगी है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मंडियों में किसानों से अवैध रूप से मजदूरी और अन्य शुल्क वसूले जा रहे हैं। कई किसानों को अपनी उपज बेचने के बाद भुगतान के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है, जबकि सरकार लगातार व्यवस्था को पारदर्शी और डिजिटल बताने का दावा कर रही है।
अभय चौटाला ने सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि इस वर्ष मंडियों में लगभग 84.76 लाख टन गेहूं की आवक दर्ज की गई है, जिसमें से करीब 83 लाख टन गेहूं एमएसपी पर खरीदा गया। उन्होंने कहा कि पिछले साल की तुलना में इस बार करीब 15 लाख टन अधिक खरीद दिखाई गई है, जबकि वास्तविक उत्पादन में इतनी बड़ी बढ़ोतरी नहीं हुई। उनके अनुसार यही अतिरिक्त गेहूं उत्तर प्रदेश से लाकर हरियाणा की मंडियों में बेचा गया।
उन्होंने सरकार पर यह आरोप भी लगाया कि पूरे मामले को छिपाने के लिए अभी तक ई-खरीद पोर्टल पर खरीद से संबंधित पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। चौटाला ने मांग की कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
वहीं, राजनीतिक गलियारों में इस बयान के बाद हलचल तेज हो गई है। विपक्षी दल सरकार से गेहूं खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता पर जवाब मांग रहे हैं। किसान संगठनों ने भी भुगतान में देरी और मंडियों में अव्यवस्थाओं को लेकर चिंता जताई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है तो यह मामला केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे एमएसपी व्यवस्था और सरकारी खरीद प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य सरकार इन आरोपों का क्या जवाब देती है और क्या किसी जांच की घोषणा की जाती है।

