पेट्रोल-डीजल को GST के दायरे में लाने की मांग तेज, CTI ने प्रधानमंत्री को लिखा पत्र
देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर आम लोगों और व्यापार जगत की चिंता लगातार बढ़ रही है। ईंधन के बढ़ते दामों का असर न केवल वाहन चालकों की जेब पर पड़ता है, बल्कि परिवहन लागत, वस्तुओं की कीमतों और उद्योगों के खर्च पर भी सीधा प्रभाव दिखाई देता है। इसी मुद्दे को लेकर व्यापारिक संगठन चेंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) ने केंद्र सरकार से पेट्रोल और डीजल को वस्तु एवं सेवा कर यानी GST के दायरे में शामिल करने की मांग की है।
CTI के चेयरमैन बृजेश गोयल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर अपील की है कि पेट्रोल और डीजल पर लागू मौजूदा टैक्स व्यवस्था की समीक्षा की जाए। संगठन का कहना है कि अगर इन दोनों प्रमुख ईंधनों को GST व्यवस्था में शामिल किया जाता है, तो देशभर में कीमतों में एकरूपता आ सकती है और आम जनता के साथ-साथ व्यापारियों को भी राहत मिल सकती है।
फिलहाल पेट्रोल और डीजल को GST से बाहर रखा गया है। इन पर केंद्र सरकार की ओर से एक्साइज ड्यूटी और राज्य सरकारों की ओर से वैट लगाया जाता है। इसके अलावा डीलर कमीशन और अन्य शुल्क भी कीमतों को प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि अलग-अलग राज्यों में पेट्रोल और डीजल के दामों में काफी अंतर देखने को मिलता है।
CTI ने क्यों उठाई GST में शामिल करने की मांग?
चेंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री का कहना है कि मौजूदा टैक्स व्यवस्था के कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतें कई स्तरों पर प्रभावित होती हैं। केंद्र और राज्य सरकारों के अलग-अलग टैक्स लगाने से अंतिम कीमत काफी बढ़ जाती है, जिसका असर आम उपभोक्ताओं और कारोबारियों दोनों पर पड़ता है।
संगठन के अनुसार, पेट्रोल और डीजल को GST के अंतर्गत लाने से टैक्स प्रणाली आसान हो सकती है। इससे पूरे देश में ईंधन की कीमतों में अंतर कम होने की संभावना है और व्यापारियों को माल ढुलाई की लागत का बेहतर अनुमान लगाने में मदद मिल सकती है।
CTI का मानना है कि ईंधन की कीमतों में कमी आने से परिवहन खर्च घट सकता है। इसका असर खाद्य पदार्थों, रोजमर्रा की वस्तुओं और अन्य सामानों की कीमतों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि ज्यादातर सामानों की सप्लाई चेन में पेट्रोल और डीजल का महत्वपूर्ण योगदान होता है।
अलग-अलग राज्यों में VAT की वजह से बदलते हैं पेट्रोल-डीजल के दाम
भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें हर राज्य में अलग-अलग होती हैं। इसका बड़ा कारण राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले VAT की अलग-अलग दरें हैं। कुछ राज्यों में VAT अधिक होने के कारण ईंधन महंगा मिलता है, जबकि कम VAT वाले राज्यों में इसकी कीमत अपेक्षाकृत कम रहती है।
CTI चेयरमैन बृजेश गोयल ने उदाहरण देते हुए बताया कि तेलंगाना जैसे राज्यों में अधिक VAT के कारण पेट्रोल की कीमत ज्यादा रहती है। वहीं अंडमान-निकोबार जैसे क्षेत्रों में कम टैक्स होने की वजह से ईंधन अपेक्षाकृत सस्ता उपलब्ध होता है।
संगठन का कहना है कि जब देश में GST लागू किया गया था, तब इसका उद्देश्य ‘वन नेशन, वन टैक्स’ व्यवस्था बनाना था। हालांकि पेट्रोल और डीजल अभी भी इस व्यवस्था से बाहर हैं, जिसके कारण राज्यों के बीच कीमतों में अंतर बना हुआ है।
GST लागू होने से क्या हो सकते हैं संभावित बदलाव?
अगर भविष्य में पेट्रोल और डीजल को GST के दायरे में शामिल किया जाता है, तो टैक्स व्यवस्था में बदलाव आ सकता है। वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकारें अलग-अलग टैक्स वसूलती हैं, जबकि GST व्यवस्था में एक निश्चित टैक्स स्लैब के तहत कीमत तय की जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, GST लागू होने से ईंधन की कीमतों में कमी आ सकती है, लेकिन इसका अंतिम असर इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार किस GST स्लैब को लागू करती है। क्योंकि पेट्रोल और डीजल से केंद्र और राज्य सरकारों को बड़ी मात्रा में राजस्व प्राप्त होता है, इसलिए इस पर फैसला आर्थिक और नीतिगत पहलुओं को ध्यान में रखकर लिया जाता है।
पेट्रोल-डीजल की कीमत में कैसे जुड़ते हैं टैक्स?
पेट्रोल और डीजल की अंतिम कीमत केवल कच्चे तेल की कीमत पर निर्भर नहीं करती। इसमें कई अलग-अलग घटक शामिल होते हैं। कच्चे तेल की खरीद कीमत, रिफाइनिंग खर्च, तेल कंपनियों का मार्जिन, केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी, राज्य सरकार का VAT और पेट्रोल पंप डीलर का कमीशन मिलकर अंतिम कीमत तय करते हैं।
CTI द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, दिल्ली में पेट्रोल की बेस कीमत एक निश्चित स्तर पर रहने के बावजूद टैक्स और अन्य शुल्क जुड़ने के बाद उपभोक्ताओं को अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। डीजल के मामले में भी इसी तरह कई टैक्स और खर्च शामिल होते हैं।
व्यापार और उद्योग पर बढ़ती ईंधन लागत का असर
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बदलाव का असर केवल निजी वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहता। ट्रांसपोर्ट सेक्टर, लॉजिस्टिक्स कंपनियां, छोटे व्यापारी और उद्योग भी इससे प्रभावित होते हैं।
माल ढुलाई महंगी होने पर कंपनियों की लागत बढ़ती है, जिसका असर उत्पादों की कीमतों पर दिखाई दे सकता है। छोटे कारोबारियों के लिए बढ़ता परिवहन खर्च अतिरिक्त चुनौती बन जाता है।
CTI का कहना है कि ईंधन को GST के तहत लाने से व्यापार जगत को स्थिरता मिल सकती है और कंपनियां बेहतर तरीके से अपने खर्च की योजना बना सकती हैं।
सरकार के सामने राजस्व संतुलन की चुनौती
हालांकि पेट्रोल और डीजल को GST में शामिल करने की मांग लंबे समय से उठती रही है, लेकिन इसके साथ केंद्र और राज्य सरकारों के राजस्व से जुड़ा मुद्दा भी सामने आता है। पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाले टैक्स सरकारों के लिए आय का एक बड़ा स्रोत हैं।
ऐसे में किसी भी बदलाव के लिए केंद्र और राज्यों के बीच सहमति जरूरी होगी। GST परिषद में इस विषय पर चर्चा और सभी पक्षों की सहमति के बाद ही कोई बड़ा फैसला लिया जा सकता है।
CTI की अपील और आगे की राह
चेंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि पेट्रोल और डीजल पर लगने वाली मौजूदा टैक्स व्यवस्था में सुधार किया जाए। संगठन का कहना है कि ईंधन की कीमतों में राहत मिलने से आम नागरिकों, व्यापारियों और उद्योगों को फायदा हो सकता है।
फिलहाल पेट्रोल और डीजल को GST में शामिल करने का फैसला सरकार और GST परिषद के स्तर पर निर्भर करेगा। आने वाले समय में इस मुद्दे पर होने वाली चर्चा पर आम लोगों और व्यापार जगत की नजर बनी हुई है।




