पंजाब में जमीन उपयोग परिवर्तन (CLU) और रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स की मंजूरियों को लेकर अब प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अपनी जांच और तेज कर दी है। ग्रेटर मोहाली एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (GMADA) और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग (DTCP) से जुड़ी कई फाइलें एजेंसी के रडार पर आ गई हैं। अजय सहगल की गिरफ्तारी के बाद जांच का दायरा बढ़ाते हुए अब उन अधिकारियों और निजी व्यक्तियों की भूमिका की पड़ताल शुरू कर दी गई है, जिन्होंने परियोजनाओं को मंजूरी देने की प्रक्रिया में हिस्सा लिया था।
सूत्रों के मुताबिक, जांच एजेंसी को कई ऐसे दस्तावेज मिले हैं जिनसे संकेत मिल रहे हैं कि कुछ प्रोजेक्ट्स को सामान्य प्रक्रिया से कहीं अधिक तेजी से मंजूरी दी गई। खासकर मास्टर प्लान में बदलाव, भूमि उपयोग परिवर्तन और रिहायशी एवं कमर्शियल प्रोजेक्ट्स के लिए दी गई स्वीकृतियों को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। ईडी अब यह पता लगाने में जुटी है कि किन स्तरों पर नियमों में ढील दी गई और क्या फाइलों को प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाया गया।
जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ मामलों में इंस्टीट्यूशनल उपयोग के लिए निर्धारित जमीन को रिहायशी उपयोग में बदलने की मंजूरी दी गई। एजेंसी अब उन बैठकों के रिकॉर्ड और बोर्ड एजेंडा की समीक्षा कर रही है, जिनमें ऐसे प्रस्तावों को मंजूरी मिली थी। अधिकारियों की टिप्पणियां, फाइल मूवमेंट और मंजूरी की टाइमलाइन को खंगालकर यह समझने की कोशिश की जा रही है कि कहीं प्रक्रिया को जानबूझकर तेज तो नहीं किया गया।
ईडी का फोकस अब सिर्फ अंतिम मंजूरी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया को जांच के दायरे में लाया गया है। कौन-सी फाइल किस अधिकारी के पास कितने समय तक रही, किस स्तर पर आपत्तियां उठीं और उन्हें कैसे दरकिनार किया गया, इन सभी पहलुओं की विस्तार से जांच हो रही है। एजेंसी यह भी देख रही है कि तकनीकी और कानूनी आपत्तियों के बावजूद कुछ फाइलें रिकॉर्ड समय में कैसे पास हुईं।
सूत्रों का कहना है कि एजेंसी को कुछ ऐसे इनपुट भी मिले हैं, जिनमें कथित रूप से अवैध लाभ, कमीशन और किकबैक के बदले फाइलों को मंजूरी देने की बात सामने आई है। इसी एंगल पर अब वित्तीय लेन-देन और संबंधित अधिकारियों की संपत्तियों की भी जांच की जा सकती है। ईडी को शक है कि कुछ प्राइवेट डेवलपर्स और विभागीय अधिकारियों के बीच गठजोड़ के जरिए पूरे सिस्टम का दुरुपयोग किया गया।
जांच के दौरान आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए आरक्षित प्लॉटों से जुड़ी अनियमितताएं भी एजेंसी के रडार पर हैं। आरोप हैं कि जिन प्लॉटों को नियमों के अनुसार संबंधित अथॉरिटी को ट्रांसफर किया जाना था, उनमें देरी और प्रक्रिया संबंधी गड़बड़ियां हुईं। अब एजेंसी इस बात की भी जांच कर रही है कि इन फैसलों से किसे लाभ पहुंचा और जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है।
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इस कार्रवाई को बेहद अहम माना जा रहा है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में कई और अधिकारियों, बिल्डरों और संबंधित लोगों से पूछताछ हो सकती है। ईडी की यह जांच केवल एक परियोजना तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि पूरे रियल एस्टेट अप्रूवल सिस्टम की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर रही है।




