अमेरिका और क्यूबा के बीच दशकों पुरानी दुश्मनी एक बार फिर सुर्खियों में है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति राउल कास्त्रो पर गंभीर आरोप लगाते हुए पुराने “ब्रदर्स टू द रेस्क्यू” मामले को दोबारा हवा दे दी है। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि कैरेबियन क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य गतिविधियां भी बढ़ गई हैं और क्यूबा ने इसे अपने खिलाफ दबाव की रणनीति बताया है।
दरअसल यह विवाद केवल एक पुराने विमान हादसे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें करीब सात दशक पुराने राजनीतिक संघर्ष, साम्यवाद बनाम पूंजीवाद की लड़ाई और शीत युद्ध की राजनीति में छिपी हुई हैं। अमेरिका और क्यूबा का रिश्ता लंबे समय से अविश्वास, प्रतिबंधों और टकराव से भरा रहा है।
कैसे शुरू हुई अमेरिका-क्यूबा की दुश्मनी?
1950 के दशक तक क्यूबा में फुल्गेंशियो बतिस्ता की सरकार थी, जिसे अमेरिका का समर्थन प्राप्त था। लेकिन 1959 में फिदेल कास्त्रो और चे ग्वेरा के नेतृत्व में क्रांति हुई और बतिस्ता शासन को उखाड़ फेंका गया। इसके बाद क्यूबा में कम्युनिस्ट सरकार बनी और अमेरिकी कंपनियों की संपत्तियों का राष्ट्रीयकरण शुरू हो गया। कास्त्रो सरकार के इस फैसले ने अमेरिका को नाराज कर दिया। अमेरिका को डर था कि सोवियत संघ का प्रभाव उसके बेहद करीब बढ़ रहा है। इसके बाद दोनों देशों के रिश्ते लगातार बिगड़ते चले गए।
बे ऑफ पिग्स हमला और बढ़ा तनाव
फिदेल कास्त्रो की सरकार गिराने के लिए अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने क्यूबा से भागे लोगों को प्रशिक्षित किया। अप्रैल 1961 में इन्हीं लोगों ने “बे ऑफ पिग्स” इलाके में हमला किया, लेकिन क्यूबा की सेना ने इस ऑपरेशन को पूरी तरह नाकाम कर दिया। इस असफलता ने अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी किरकिरी कराई। इस घटना के बाद क्यूबा और ज्यादा सोवियत संघ के करीब पहुंच गया। यही नजदीकी बाद में दुनिया के सबसे खतरनाक परमाणु संकट में बदल गई।
जब दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के करीब पहुंच गई
1962 में सोवियत संघ ने क्यूबा में परमाणु मिसाइलें तैनात कर दीं। ये मिसाइलें सीधे अमेरिकी शहरों को निशाना बना सकती थीं। अमेरिका ने इसे अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा माना और दुनिया परमाणु युद्ध के मुहाने पर पहुंच गई। करीब 13 दिन तक चले तनावपूर्ण माहौल के बाद सोवियत संघ मिसाइलें हटाने के लिए तैयार हुआ। बदले में अमेरिका ने क्यूबा पर हमला न करने का आश्वासन दिया। हालांकि इसके बावजूद दोनों देशों के रिश्तों में कभी सामान्य स्थिति नहीं लौट सकी।
आर्थिक प्रतिबंधों ने बढ़ाई दूरी
क्यूबा मिसाइल संकट के बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी ने क्यूबा पर कठोर आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंध लगा दिए। इन प्रतिबंधों का असर क्यूबा की अर्थव्यवस्था पर लंबे समय तक पड़ा। बाद के वर्षों में कई अमेरिकी सरकारों ने इन पाबंदियों को जारी रखा। बराक ओबामा के कार्यकाल में दोनों देशों के रिश्तों में कुछ नरमी जरूर देखने को मिली। राजनयिक संबंध बहाल करने और बातचीत शुरू करने की कोशिश हुई, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद फिर से क्यूबा पर सख्त नीति लागू कर दी गई।
कौन हैं राउल कास्त्रो?
राउल कास्त्रो, फिदेल कास्त्रो के छोटे भाई हैं और क्यूबा की क्रांति के शुरुआती दौर से ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। लंबे समय तक वे क्यूबा के रक्षा मंत्री रहे और सेना पर उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती थी। जब फिदेल कास्त्रो की तबीयत खराब हुई तो 2006 में राउल को सत्ता सौंपी गई और 2008 में वे आधिकारिक तौर पर राष्ट्रपति बन गए। उन्होंने 2018 तक देश की कमान संभाली। राउल को फिदेल की तुलना में ज्यादा व्यावहारिक नेता माना जाता था। उनके कार्यकाल में क्यूबा में सीमित आर्थिक सुधार भी हुए।
क्या था “ब्रदर्स टू द रेस्क्यू” मामला?
1990 के दशक में अमेरिका के मियामी में बसे क्यूबाई मूल के लोगों ने “Brothers to the Rescue” नाम का संगठन बनाया था। शुरुआत में यह संगठन समुद्र में फंसे क्यूबाई शरणार्थियों को बचाने का काम करता था। लेकिन समय के साथ संगठन क्यूबा सरकार के खिलाफ सक्रिय होने लगा। उस पर क्यूबा के हवाई क्षेत्र में घुसने और सरकार विरोधी पर्चे गिराने के आरोप लगे। क्यूबा सरकार इसे अपनी संप्रभुता के खिलाफ कार्रवाई मानती थी।
24 फरवरी 1996 को इस संगठन के तीन छोटे विमान उड़ान पर निकले। क्यूबा का आरोप था कि ये विमान उसकी सीमा में दाखिल हो गए थे। इसके बाद क्यूबा की वायुसेना ने कार्रवाई करते हुए दो विमानों को मार गिराया। इस हमले में चार अमेरिकी नागरिकों की मौत हो गई। अमेरिका ने इसे अंतरराष्ट्रीय हवाई क्षेत्र में हुआ हमला बताया, जबकि क्यूबा ने दावा किया कि उसने आत्मरक्षा में कदम उठाया। बाद में अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसी ICAO की रिपोर्ट में कहा गया कि विमान अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में गिराए गए थे।
हेल्म्स-बर्टन कानून से और बिगड़े रिश्ते
इस घटना के बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने Helms-Burton Act पर हस्ताक्षर किए। इस कानून के जरिए क्यूबा पर लगे प्रतिबंध और कठोर कर दिए गए। इतना ही नहीं, भविष्य में प्रतिबंध हटाने की शक्ति भी केवल राष्ट्रपति के हाथ में नहीं रही और कांग्रेस की मंजूरी जरूरी हो गई। विशेषज्ञ मानते हैं कि इसी घटना के बाद दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने की संभावनाएं लगभग खत्म हो गई थीं।
ट्रंप प्रशासन ने फिर उठाया पुराना मामला
अब करीब 30 साल बाद यह मामला फिर चर्चा में है। अमेरिका ने राउल कास्त्रो के खिलाफ हत्या की साजिश से जुड़े आरोपों को दोबारा उछाला है। ट्रंप ने बयान दिया कि अमेरिका क्यूबा के लोगों की आजादी का समर्थन करता है और वहां लोकतंत्र बहाल करना चाहता है।
क्यूबा ने इसे राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश बताया है। क्यूबा के राष्ट्रपति मिगुएल डियाज-कानेल ने कहा कि अमेरिका सैन्य कार्रवाई का माहौल बना रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि हमला हुआ तो गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
कैरेबियन में बढ़ी अमेरिकी सैन्य मौजूदगी
तनाव के बीच अमेरिका ने कैरेबियन क्षेत्र में अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ा दी हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक USS Nimitz स्ट्राइक ग्रुप को इलाके में तैनात किया गया है। इसके साथ F/A-18 Super Hornet लड़ाकू विमान, निगरानी ड्रोन और नौसैनिक जहाज भी सक्रिय हैं।
अमेरिकी निगरानी विमान P-8A Poseidon और MQ-4C Triton ड्रोन को भी क्यूबा के आसपास उड़ान भरते देखा गया है। हालांकि अमेरिका की तरफ से इसे नियमित सैन्य गतिविधि बताया जा रहा है, लेकिन क्यूबा इसे दबाव बनाने की रणनीति मान रहा है।
क्यों अहम है यह टकराव?
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका और क्यूबा का यह विवाद केवल दो देशों की लड़ाई नहीं है। इसमें शीत युद्ध की विरासत, साम्यवादी राजनीति, लैटिन अमेरिका में अमेरिकी प्रभाव और वैश्विक शक्ति संतुलन जैसे कई बड़े मुद्दे जुड़े हुए हैं।
ईरान और वेनेजुएला के बाद अब क्यूबा पर बढ़ता अमेरिकी दबाव यह संकेत दे रहा है कि ट्रंप प्रशासन अपने पुराने विरोधियों के खिलाफ फिर से आक्रामक नीति अपना सकता है। वहीं क्यूबा भी पीछे हटने के मूड में नजर नहीं आ रहा। ऐसे में आने वाले दिनों में कैरेबियन क्षेत्र की स्थिति और ज्यादा संवेदनशील हो सकती है।
(Photo : AI Generated)




