इजराइल पर पाकिस्तान का सख्त रुख कायम, ट्रम्प की अपील भी बेअसर

इजराइल पर पाकिस्तान का सख्त रुख कायम, ट्रम्प की अपील भी बेअसर

पाकिस्तान ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि वह इजराइल को मान्यता देने के पक्ष में नहीं है। रक्षा मंत्री Khawaja Asif ने कहा कि देश अपनी वैचारिक और राजनीतिक नीतियों से समझौता नहीं करेगा। उनके मुताबिक पाकिस्तान का रुख दशकों से स्पष्ट है और इसमें बदलाव की कोई संभावना नहीं दिखती।

असल में हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने मुस्लिम देशों से अपील की थी कि वे इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करें और अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा बनें। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि पाकिस्तान पर भी इस दिशा में कदम बढ़ाने का दबाव बनाया गया था, खासकर अमेरिका-ईरान शांति प्रयासों के संदर्भ में।

पाकिस्तान के लिए क्यों मुश्किल है इजराइल को मान्यता देना

पाकिस्तान लंबे समय से फिलिस्तीन के समर्थन को अपनी विदेश नीति का अहम हिस्सा मानता रहा है। वहां की घरेलू राजनीति और जनता के बीच फिलिस्तीन मुद्दा धार्मिक और भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है। ऐसे में किसी भी सरकार के लिए इजराइल के साथ खुलकर संबंध बनाना बड़ा राजनीतिक जोखिम माना जाता है।

पाकिस्तान का आधिकारिक रुख यह रहा है कि जब तक 1967 की सीमाओं के आधार पर स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र का गठन नहीं होता, तब तक इजराइल को मान्यता नहीं दी जाएगी। यही वजह है कि पिछले करीब 78 वर्षों में पाकिस्तान ने कभी इजराइल के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए।

ट्रम्प की पश्चिम एशिया रणनीति

रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रम्प पश्चिम एशिया में एक नए अमेरिकी समर्थक गठबंधन की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें इजराइल और प्रमुख अरब देश साथ आएं। इसी रणनीति के तहत 2020 में अब्राहम अकॉर्ड्स सामने आया था, जिसके जरिए UAE, बहरीन और मोरक्को जैसे देशों ने इजराइल से संबंध स्थापित किए।

ट्रम्प का दावा है कि इस समझौते से जुड़े देशों को व्यापार, निवेश और सुरक्षा के स्तर पर बड़ा फायदा हुआ है। उन्होंने इसे पश्चिम एशिया में स्थिरता और आर्थिक मजबूती की दिशा में बड़ा कदम बताया।

गाजा युद्ध के बाद बदले हालात

हालांकि गाजा युद्ध के बाद अरब देशों में इजराइल को लेकर नाराजगी बढ़ी है। फिलिस्तीन का मुद्दा फिर से केंद्र में आ गया है। Mohammed bin Salman के नेतृत्व वाला सऊदी अरब भी अब साफ कह चुका है कि फिलिस्तीनी राष्ट्र की दिशा में ठोस कदम उठे बिना वह इजराइल से संबंध सामान्य नहीं करेगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान भी इसी संवेदनशील माहौल को देखते हुए अपना रुख बदलने से बच रहा है। देश के भीतर यह धारणा मजबूत है कि इजराइल को मान्यता देना पाकिस्तान की स्थापना के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा।

इमरान खान ने भी ठुकराया था प्रस्ताव

पूर्व प्रधानमंत्री Imran Khan ने भी अपने कार्यकाल के दौरान अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि ऐसा करना पाकिस्तान की पुरानी दो-राष्ट्र समाधान नीति के खिलाफ होगा। सत्ता से हटने के बाद इमरान खान ने दावा किया था कि उनकी सरकार पर इजराइल से रिश्ते सामान्य करने के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया गया था। हालांकि उन्होंने किसी देश का नाम नहीं लिया था।

कश्मीर और फिलिस्तीन को जोड़कर देखता है पाकिस्तान

विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान लंबे समय से कश्मीर और फिलिस्तीन के मुद्दों को समान नैरेटिव में पेश करता रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वह फिलिस्तीन के समर्थन को अपनी कश्मीर नीति से जोड़कर देखता है। ऐसे में अगर पाकिस्तान इजराइल को मान्यता देता है तो उसका राजनीतिक और कूटनीतिक तर्क कमजोर पड़ सकता है।