मनाली के कचरा प्रबंधन पर हाईकोर्ट सख्त: 300 किलोमीटर दूर अंबाला भेजे जा रहे गीले कचरे पर उठाए सवाल

मनाली के कचरा प्रबंधन पर हाईकोर्ट सख्त: 300 किलोमीटर दूर अंबाला भेजे जा रहे गीले कचरे पर उठाए सवाल

Himachal Pradesh में पर्यावरण और कचरा प्रबंधन को लेकर एक बार फिर प्रशासनिक व्यवस्थाएं सवालों के घेरे में आ गई हैं। Himachal Pradesh High Court ने Manali नगर परिषद द्वारा गीले कचरे को करीब 300 किलोमीटर दूर Ambala भेजे जाने के फैसले पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने पूछा है कि जब कचरे को इतनी लंबी दूरी तक ले जाने से अतिरिक्त प्रदूषण और दुर्गंध फैल रही है, तो इसे पर्यावरण संरक्षण कैसे माना जा सकता है।

मुख्य न्यायाधीश Gurmeet Singh Sandhawalia और न्यायाधीश B C Negi की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि गीले कचरे को लंबी दूरी तक ट्रांसपोर्ट करना पर्यावरणीय दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि एक तरफ यह कचरा पूरे रास्ते में दुर्गंध फैलाता है और दूसरी तरफ भारी वाहनों की आवाजाही से अतिरिक्त कार्बन उत्सर्जन भी होता है, जिससे प्रदूषण कम होने के बजाय और बढ़ता है।

हाईकोर्ट ने मामले में अगली सुनवाई के दौरान मनाली नगर परिषद के कार्यकारी अधिकारी और संबंधित कंपनी Suntan Life Private Limited के अधिकृत प्रतिनिधि को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने के निर्देश दिए हैं।

कोर्ट के सामने रखी गई निरीक्षण रिपोर्ट में कई गंभीर खामियां उजागर हुईं। 21 फरवरी 2026 को हुए निरीक्षण के दौरान पाया गया कि कचरा संयंत्र में मिश्रित कचरे के कारण आसपास के क्षेत्रों में तेज दुर्गंध फैल रही थी। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि वहां मक्खियों और बदबू को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त व्यवस्था मौजूद नहीं थी।

निरीक्षण में यह भी सामने आया कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 के तहत आवश्यक 100 प्रतिशत स्रोत पृथक्करण नहीं किया जा रहा था। गीला कचरा खुले में पड़ा हुआ था, जिससे जहरीला लीचेट बन रहा था। यह लीचेट बिना उपचार के आसपास के क्षेत्रों और जल स्रोतों की ओर बह रहा था। कोर्ट ने इस स्थिति को पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों के लिए गंभीर खतरा माना।

रिपोर्ट के अनुसार, नगर परिषद द्वारा गीले कचरे को अंबाला के जटवार स्थित बायोगैस संयंत्र तक भेजा जा रहा है क्योंकि मनाली में स्थानीय स्तर पर गीले कचरे के उपचार की पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। अदालत ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत भी दिया कि स्थानीय स्तर पर कचरा निस्तारण ढांचा विकसित करने में प्रशासन विफल रहा है।

मामले में सबसे गंभीर चिंता Beas River के पास जमा कचरे को लेकर जताई गई। रिपोर्ट में कहा गया कि जैव-खनन प्रक्रिया वैज्ञानिक तरीके से नहीं की जा रही थी और कचरे से निकलने वाला लीचेट बिना उपचार सीधे नदी की ओर बह रहा था। यह स्थिति नदी के पारिस्थितिकी तंत्र और जल गुणवत्ता दोनों के लिए खतरनाक मानी गई है।

अदालत को यह भी बताया गया कि जनवरी 2026 तक करीब 78 हजार टन से अधिक पुराने कचरे में से केवल लगभग 32 हजार टन का ही प्रसंस्करण किया जा सका है, जबकि 45 हजार टन से अधिक कचरा अब भी लंबित पड़ा हुआ है। इसी लापरवाही को देखते हुए मनाली नगर परिषद पर 15.30 लाख रुपये का पर्यावरणीय मुआवजा और लगभग 2.83 करोड़ रुपये का अतिरिक्त जुर्माना लगाया गया है।

हाईकोर्ट की सख्ती के बाद अब प्रदेश में पर्यटन स्थलों पर कचरा प्रबंधन की व्यवस्था को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पहाड़ी क्षेत्रों में आधुनिक व स्थानीय कचरा उपचार संयंत्र विकसित नहीं किए गए, तो आने वाले समय में पर्यावरणीय संकट और गहरा सकता है।