भारत में शादी तय करते समय आमतौर पर परिवार, जाति, नौकरी और कुंडली जैसी चीजों को अहमियत दी जाती है, लेकिन अब स्वास्थ्य जांच भी धीरे-धीरे इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही है। खासतौर पर थैलेसीमिया जैसी जेनेटिक बीमारी को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ रही है।
8 मई को मनाए जाने वाले International Thalassaemia Day के मौके पर डॉक्टरों ने फिर जोर दिया है कि शादी से पहले एक साधारण ब्लड टेस्ट कई परिवारों को भविष्य की बड़ी परेशानियों से बचा सकता है।
दरअसल, थैलेसीमिया एक आनुवंशिक बीमारी है, जो माता-पिता से बच्चों तक पहुंचती है। कई बार व्यक्ति खुद पूरी तरह स्वस्थ दिखाई देता है, लेकिन वह इस बीमारी का ‘कैरियर’ हो सकता है। परेशानी तब बढ़ती है जब दो कैरियर शादी करते हैं। ऐसे मामलों में बच्चे को थैलेसीमिया मेजर होने का खतरा रहता है, जिसमें जिंदगीभर बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है।
इसी वजह से अब कई परिवार शादी से पहले लड़का और लड़की दोनों की मेडिकल स्क्रीनिंग रिपोर्ट देखने लगे हैं। युवाओं का मानना है कि यह केवल एक टेस्ट नहीं, बल्कि आने वाले परिवार की सुरक्षा और जिम्मेदारी से जुड़ा फैसला है। स्वास्थ्य संस्थान भी शादी के सीजन में जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को इस जांच के फायदे समझा रहे हैं।
हालांकि, समाज में अब भी इस विषय को लेकर कई भ्रांतियां मौजूद हैं। बहुत से लोग कैरियर होने को बीमारी समझ लेते हैं, जबकि कैरियर व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है। डर और सामाजिक दबाव की वजह से कई लोग अपनी रिपोर्ट छिपा लेते हैं ताकि रिश्ता टूटने की नौबत न आए। इसका असर खासतौर पर महिलाओं पर ज्यादा पड़ता है, क्योंकि अक्सर उनकी सेहत और मां बनने की क्षमता पर सवाल उठाए जाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि थोड़ी-सी सावधानी बच्चों को जिंदगीभर की तकलीफ से बचा सकती है। साइप्रस और ईरान जैसे देशों ने शादी से पहले टेस्टिंग और काउंसलिंग को बढ़ावा देकर थैलेसीमिया के मामलों में बड़ी कमी लाई है। भारत में भी अब धीरे-धीरे लोग अपनी मैट्रिमोनियल प्रोफाइल में ब्लड ग्रुप और हेल्थ डिटेल्स साझा करने लगे हैं।
अब यह मुद्दा सिर्फ मेडिकल जांच तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि रिश्तों में पारदर्शिता और जागरूकता का प्रतीक बनता जा रहा है।
(Photo : AI Generated)




