पंजाब में न्यायिक अधिकारियों के लिए आवास और अदालतों के बुनियादी ढांचे की कमी को लेकर पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि राज्य के कई जिलों में जजों को किराए के मकानों में रहना पड़ रहा है, जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा के लिए चिंताजनक स्थिति है।
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि करीब 60 प्रतिशत न्यायिक अधिकारी, यहां तक कि जिला एवं सत्र न्यायाधीश भी किराए के घरों में रह रहे हैं। इस पर कोर्ट ने आश्चर्य जताते हुए पंजाब के मुख्य सचिव से विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा है।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि किसी जज का मकान मालिक ही उसके सामने किसी मामले में पक्षकार बनकर आ जाए, तो इससे असहज स्थिति पैदा हो सकती है। इसी संदर्भ में मोहाली की एक घटना का जिक्र किया गया, जहां जज निचली मंजिल पर रहते थे जबकि मकान मालिक उसी इमारत की ऊपरी मंजिल पर रहता था।
कोर्ट को यह भी जानकारी दी गई कि मोगा में 1990 के दशक से न्यायिक आवास की जरूरत बताई जा रही थी, लेकिन जमीन अधिग्रहण में लंबा समय लग गया। वहीं पठानकोट में चिन्हित जमीन वन क्षेत्र होने के कारण मामला आगे नहीं बढ़ सका। मोहाली (एसएएस नगर) में भी न्यायिक आवास के लिए जमीन उपलब्ध कराने में करीब दो दशक की देरी हुई।
मामले को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को निर्देश दिए हैं कि वे इन देरी के कारणों पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करें। साथ ही मोगा, पठानकोट और एसएएस नगर से संबंधित ताजा स्थिति रिपोर्ट भी अदालत में दाखिल करने को कहा गया है। अदालत ने संकेत दिया कि फिलहाल इन जिलों से शुरुआत कर मामले को चरणबद्ध तरीके से सुना जाएगा।



