देशभर में तापमान लगातार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रहा है और इसका असर अब जानलेवा साबित हो रहा है। राजधानी दिल्ली सहित कई राज्यों में पारा 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है, जिसके चलते मौसम विभाग (IMD) ने येलो अलर्ट जारी किया है। बढ़ती गर्मी सिर्फ परेशानी नहीं, बल्कि मौतों का कारण भी बन रही है।
गृह मंत्रालय के तहत नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक, 2018 से 2022 के बीच देश में हीटवेव की वजह से कुल 3798 लोगों की जान गई। इन आंकड़ों से साफ है कि हर साल सैकड़ों लोग भीषण गर्मी की चपेट में आ रहे हैं।
राज्यों की बात करें तो महाराष्ट्र सबसे आगे रहा, जहां इन पांच सालों में 470 लोगों की मौत दर्ज की गई। खासतौर पर 2019 में यहां 159 लोगों ने दम तोड़ा। इसके बाद बिहार दूसरे स्थान पर रहा, जहां कुल 467 मौतें हुईं, जिनमें से अकेले 2019 में 215 लोगों की जान गई।
पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में भी हालात चिंताजनक रहे। पंजाब में 2018 से 2022 के बीच 459 लोगों की मौत हुई, जबकि उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 508 तक पहुंच गया। तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में भी हर साल कई लोगों की जान हीटवेव के कारण गई।
दिलचस्प बात यह है कि कुछ पूर्वोत्तर राज्यों और पहाड़ी इलाकों में गर्मी से मौत के मामले बेहद कम या शून्य रहे, जो वहां के मौसम के प्रभाव को दर्शाता है।
हीटवेव कैसे तय होती है?
मौसम विभाग के अनुसार, हीटवेव घोषित करने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग मानक तय किए गए हैं। मैदानी इलाकों में जब अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा हो जाता है, तो इसे हीटवेव माना जाता है। अगर तापमान सामान्य से 6.5 डिग्री या उससे अधिक बढ़ जाए, तो स्थिति को गंभीर हीटवेव कहा जाता है।
तेजी से बढ़ती गर्मी अब केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य संकट बनती जा रही है। आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि अगर समय रहते सतर्कता नहीं बरती गई, तो आने वाले सालों में यह खतरा और बढ़ सकता है।




