सनातन परंपरा में मंदिर जाकर भगवान के दर्शन करने के बाद परिक्रमा करना बेहद शुभ माना जाता है। इसे केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना का हिस्सा भी माना गया है। मान्यता है कि सही नियम से की गई परिक्रमा भक्त को पूर्ण पुण्य और मानसिक शांति प्रदान करती है। हालांकि कई लोग बिना जानकारी के कई बार चक्कर लगा लेते हैं, जबकि शास्त्रों में हर देवता के लिए परिक्रमा की निश्चित संख्या बताई गई है।
परिक्रमा का आध्यात्मिक अर्थ
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार ‘परिक्रमा’ शब्द के हर अक्षर का विशेष महत्व है। यह मोक्ष, पापों के नाश, जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति और ज्ञान प्राप्ति का प्रतीक माना जाता है। परिक्रमा का भाव यह है कि इंसान अपने जीवन का केंद्र भगवान को मानता है और खुद को उनकी शक्ति के प्रति समर्पित करता है। ऐसा करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मन में स्थिरता आती है।
किस देवता की कितनी परिक्रमा करनी चाहिए?
भगवान गणेश
श्रीगणेश की 3 परिक्रमा करना शुभ माना गया है। मान्यता है कि इससे बुद्धि, विवेक और सफलता में वृद्धि होती है तथा जीवन की रुकावटें दूर होती हैं।
भगवान विष्णु, श्रीराम और श्रीकृष्ण
विष्णु भगवान और उनके अवतारों की 4 परिक्रमा करने का विधान है। यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष यानी चार पुरुषार्थों का प्रतीक मानी जाती है।
सूर्य देव
सूर्य भगवान की 7 परिक्रमा की जाती है। सात संख्या सूर्य के सात घोड़ों और सात रंगों से जुड़ी मानी जाती है। इससे स्वास्थ्य, ऊर्जा और तेज बढ़ने की मान्यता है।
मां दुर्गा और देवी स्वरूप
देवी शक्ति की केवल 1 परिक्रमा करना ही उचित माना गया है। इसे श्रद्धा और पूर्ण समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
भगवान शिव
शिवजी की परिक्रमा सबसे अलग मानी जाती है। शिवलिंग की पूरी परिक्रमा नहीं की जाती, बल्कि आधी परिक्रमा करके वापस लौटा जाता है। जहां से जल निकलता है, उस जलाधारी या सोमसूत्र को पार करना निषिद्ध माना गया है।
शिवलिंग की आधी परिक्रमा ही क्यों मानी जाती है पूर्ण?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिवलिंग की जलाधारी में शिव और शक्ति की दिव्य ऊर्जा प्रवाहित होती है। इसलिए उसे लांघना वर्जित बताया गया है। इसी वजह से आधी परिक्रमा करके लौटना ही शास्त्रों में पूर्ण और फलदायी माना गया है।




