अक्सर लोगों ने महसूस किया है कि जब उनकी तबीयत खराब होती है तो उनका पालतू कुत्ता या बिल्ली अलग तरह से व्यवहार करने लगते हैं। कोई कुत्ता मालिक के आसपास ज्यादा सतर्क हो जाता है, तो कई बिल्लियां हर समय अपने मालिक के करीब रहने लगती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह केवल संयोग नहीं बल्कि जानवरों की बेहद तेज संवेदनशील क्षमता का असर है।
विशेषज्ञों के अनुसार कुत्तों और बिल्लियों की सूंघने की शक्ति इंसानों के मुकाबले कई गुना ज्यादा होती है। जब किसी इंसान के शरीर में बीमारी विकसित होती है, तब शरीर के भीतर रासायनिक बदलाव होने लगते हैं। इन बदलावों से कुछ खास तरह के रसायन निकलते हैं, जो पसीने, सांस और शरीर की गंध के जरिए बाहर आते हैं। जानवर इन्हीं संकेतों को पकड़ लेते हैं।
वैज्ञानिक बताते हैं कि कुत्तों की नाक में करोड़ों गंध पहचानने वाले रिसेप्टर्स मौजूद होते हैं, जबकि इंसानों में इनकी संख्या बहुत कम होती है। यही वजह है कि कुत्ते बेहद हल्के रासायनिक बदलावों को भी महसूस कर लेते हैं। उनका दिमाग भी गंध को समझने में इंसानी दिमाग से कहीं ज्यादा सक्रिय माना जाता है।
शोध में यह सामने आया है कि प्रशिक्षित कुत्ते कई गंभीर बीमारियों की पहचान सूंघकर कर सकते हैं। कैंसर इसका सबसे चर्चित उदाहरण है। कई मामलों में कुत्तों ने शरीर के किसी खास हिस्से को बार-बार सूंघकर या चाटकर बीमारी का संकेत दिया, जिसके बाद जांच में वहां कैंसर पाया गया।
डायबिटीज के मरीजों की मदद के लिए भी खास तौर पर ट्रेंड डॉग्स का इस्तेमाल किया जाता है। जब ब्लड शुगर अचानक बहुत कम या ज्यादा हो जाती है, तब शरीर की गंध और सांस में बदलाव आता है। मेडिकल अलर्ट डॉग्स इन बदलावों को तुरंत पहचान लेते हैं और मरीज को सतर्क कर देते हैं।
कुछ अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि कुत्ते मिर्गी के दौरे से पहले होने वाले शरीर के बदलावों को महसूस कर सकते हैं। माना जाता है कि दौरे से पहले शरीर में हार्मोन और रसायनों का स्तर बदलने लगता है, जिसे जानवर भांप लेते हैं।
सिर्फ शारीरिक बीमारी ही नहीं, पालतू जानवर इंसानों की मानसिक स्थिति को भी समझने में सक्षम होते हैं। तनाव, घबराहट या अवसाद के दौरान शरीर में निकलने वाले हार्मोन जानवरों को संकेत देते हैं। यही कारण है कि कई बार कुत्ते और बिल्लियां ऐसे समय में अपने मालिक के ज्यादा करीब रहने लगते हैं।




