POCSO मामले में हलका इंचार्ज जसकरण देओल को राहत नहीं, हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने की याचिका ठुकराई

POCSO मामले में हलका इंचार्ज जसकरण देओल को राहत नहीं, हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने की याचिका ठुकराई

नाबालिग लड़की के कथित यौन शोषण से जुड़े गंभीर मामले में शिरोमणि अकाली दल (बादल) के हलका दाखा इंचार्ज जसकरण सिंह देओल को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है। अदालत ने उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने और गिरफ्तारी से संरक्षण देने की मांग की थी। हाईकोर्ट के इस फैसले को मामले की जांच और कानूनी प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

विस्तृत सुनवाई के बाद अदालत ने याचिका की खारिज

जानकारी के अनुसार, जसकरण देओल की ओर से अदालत में विभिन्न कानूनी दलीलें पेश की गईं और स्वयं को निर्दोष बताते हुए एफआईआर को निरस्त करने की मांग की गई थी। हालांकि, मामले से जुड़े तथ्यों और रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद अदालत ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि मामले की जांच और आगे की कार्रवाई कानून के निर्धारित प्रावधानों के अनुसार जारी रहेगी। इस फैसले के बाद अब जांच एजेंसियों के लिए कार्रवाई का रास्ता और साफ हो गया है।

POCSO और अन्य गंभीर धाराओं के तहत दर्ज है मामला

यह मामला मोहाली के मटौर थाना क्षेत्र में दर्ज एफआईआर संख्या 73 (13 मई 2026) से संबंधित है। शिकायत में एक नाबालिग लड़की के साथ कथित यौन शोषण के आरोप लगाए गए हैं। इसी आधार पर आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के साथ-साथ पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत मामला दर्ज किया गया था।

पॉक्सो कानून के तहत दर्ज मामलों को बेहद संवेदनशील माना जाता है और इनमें नाबालिगों के अधिकारों तथा सुरक्षा को विशेष महत्व दिया जाता है।

पीड़ित पक्ष ने फैसले का किया स्वागत

पीड़ित लड़की के पिता परमिंदर सिंह बिरमी ने हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इससे मामले को लेकर फैलाए जा रहे कई दावों पर सवाल खड़े हो गए हैं। उनका कहना है कि कुछ राजनीतिक नेताओं और समर्थकों की ओर से लगातार यह कहा जा रहा था कि मामला कमजोर है या समाप्त होने की स्थिति में है, लेकिन अदालत के ताजा फैसले ने ऐसी बातों को गलत साबित कर दिया है।

उन्होंने कहा कि यदि आरोपों में कोई आधार नहीं होता तो अदालत एफआईआर रद्द करने की मांग स्वीकार कर सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनके अनुसार, अदालत के आदेश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मामले की जांच और कानूनी प्रक्रिया जारी रखने के पर्याप्त आधार मौजूद हैं।

निष्पक्ष जांच और गिरफ्तारी की मांग

पीड़ित पक्ष ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन से मामले में तेजी से कार्रवाई करने की मांग की है। उनका कहना है कि जांच किसी भी राजनीतिक प्रभाव या दबाव से मुक्त होकर होनी चाहिए ताकि पीड़ित परिवार को न्याय मिल सके।

परमिंदर सिंह बिरमी ने कहा कि कानून सभी के लिए समान होना चाहिए और आरोपों की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाई जानी चाहिए। उन्होंने जांच एजेंसियों से मामले को प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाने की अपील भी की।

राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज

हाईकोर्ट के फैसले के बाद यह मामला एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी चर्चाओं के केंद्र में आ गया है। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों की नजर अब जांच की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है। वहीं, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत द्वारा याचिका खारिज किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि आरोपी दोषी घोषित हो गया है, बल्कि इसका मतलब यह है कि इस स्तर पर अदालत ने एफआईआर रद्द करने का कोई आधार नहीं पाया और जांच प्रक्रिया जारी रहने दी है।

अब आगे क्या?

हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब जांच एजेंसियां मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई कर सकती हैं। पुलिस जांच, सबूतों के संग्रह और गवाहों के बयानों के आधार पर अगला कदम तय करेगी। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए आने वाले दिनों में इस पर सभी पक्षों की नजर बनी रहने की संभावना है।