हर्बल सिगरेट को अक्सर तंबाकू का सुरक्षित और प्राकृतिक विकल्प बताकर बेचा जाता है, लेकिन हाल ही में सामने आए एक अध्ययन ने इस धारणा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शोध के अनुसार, हर्बल सिगरेट से निकलने वाला धुआं स्वास्थ्य के लिए उतना ही खतरनाक, बल्कि कुछ मामलों में सामान्य तंबाकू सिगरेट से अधिक हानिकारक हो सकता है।
यह अध्ययन जर्नल ऑफ हैजर्डस मैटेरियल्स में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं ने भारतीय बाजार में बिकने वाली कई लोकप्रिय हर्बल और तंबाकू सिगरेट के धुएं की तुलना की। जांच में धुएं के रासायनिक तत्वों, कणों के आकार और उनकी विषाक्तता से जुड़े पहलुओं का विश्लेषण किया गया।
अध्ययन में तुलसी, लौंग, दालचीनी, पुदीना, ग्रीन टी, कैमोमाइल और जल कुमुद जैसे हर्बल मिश्रणों से बनी सिगरेटों को शामिल किया गया। परिणामों में पाया गया कि हर्बल सिगरेट से निकलने वाले उत्सर्जन कई पैमानों पर तंबाकू सिगरेट के बराबर या उससे अधिक नुकसान पहुंचाने वाले थे।
शोधकर्ताओं के अनुसार, जिन हर्बल सिगरेटों में तेंदू पत्ते का उपयोग किया गया था, वे सबसे अधिक हानिकारक साबित हुईं। इनसे निकलने वाले धुएं में ऑक्सीडेटिव क्षमता अधिक पाई गई, जो शरीर में कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाले रिएक्टिव ऑक्सीजन तत्वों के निर्माण से जुड़ी होती है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि हर्बल सिगरेट के धुएं में 500 नैनोमीटर से छोटे कणों की मात्रा तंबाकू सिगरेट की तुलना में करीब 20 प्रतिशत अधिक थी। ऐसे सूक्ष्म कण फेफड़ों और हृदय संबंधी बीमारियों के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। रासायनिक जांच के दौरान एक हर्बल ब्रांड में सीसे (लेड) की सबसे अधिक मात्रा दर्ज की गई, जबकि उसका प्रचार पूरी तरह प्राकृतिक और रसायन-मुक्त उत्पाद के रूप में किया जा रहा था।
आईआईटी गांधीनगर के शोधकर्ताओं का कहना है कि “तंबाकू-मुक्त” होने का मतलब यह नहीं है कि उत्पाद पूरी तरह सुरक्षित भी हो। विशेषज्ञों ने हर्बल सिगरेट के लिए स्पष्ट नियामक मानकों की आवश्यकता पर भी जोर दिया है, क्योंकि कई उपभोक्ता इन्हें कम नुकसानदेह मानकर इस्तेमाल करते हैं।
अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि केवल “हर्बल” या “निकोटीन-फ्री” लिखे होने से किसी धूम्रपान उत्पाद को सुरक्षित नहीं माना जा सकता और इसके स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर अधिक जागरूकता की जरूरत है।




