भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की तीन दिवसीय बैठक 3 जून से शुरू हो गई है। यह बैठक 5 जून तक चलेगी, जिसके बाद RBI गवर्नर समिति के निर्णयों की घोषणा करेंगे। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार रेपो रेट में किसी बड़े बदलाव की संभावना कम है और इसे मौजूदा स्तर 5.25% पर ही बनाए रखा जा सकता है।
हर दो महीने में होती है MPC की बैठक
RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी में कुल छह सदस्य शामिल होते हैं। इनमें तीन सदस्य RBI से होते हैं, जबकि तीन सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है। समिति की बैठक आमतौर पर हर दो महीने में आयोजित की जाती है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए तय छह बैठकों में यह दूसरी बैठक है। पहली बैठक अप्रैल में आयोजित हुई थी।
पिछले साल कई बार घट चुकी हैं ब्याज दरें
साल 2025 के दौरान RBI ने आर्थिक गतिविधियों को समर्थन देने के लिए रेपो रेट में कई बार कटौती की थी। फरवरी 2025 में दर 6.50% से घटाकर 6.25% की गई, जो लगभग पांच वर्षों बाद पहली कटौती थी। इसके बाद अप्रैल में 0.25%, जून में 0.50% और दिसंबर में 0.25% की अतिरिक्त कटौती की गई। इन फैसलों के बाद रेपो रेट घटकर 5.25% पर पहुंच गया।
रेपो रेट का अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ता है?
रेपो रेट वह दर होती है जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक कर्ज उपलब्ध कराता है। जब महंगाई बढ़ने लगती है, तो RBI आमतौर पर रेपो रेट बढ़ाकर बाजार में नकदी का प्रवाह सीमित करने की कोशिश करता है। इससे बैंकों के लिए उधार लेना महंगा हो जाता है और वे ग्राहकों को दिए जाने वाले लोन की ब्याज दरें बढ़ा देते हैं। परिणामस्वरूप खर्च और मांग में कमी आती है, जिससे महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
वहीं, आर्थिक सुस्ती के दौर में RBI रेपो रेट कम कर सकता है। इससे बैंकों को सस्ता कर्ज मिलता है और वे ग्राहकों को भी कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराते हैं। इससे बाजार में नकदी बढ़ती है, निवेश और खपत को प्रोत्साहन मिलता है तथा अर्थव्यवस्था को गति मिलती है।
इस बार क्या है उम्मीद?
अर्थशास्त्रियों और बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, फिलहाल रेपो रेट में कटौती की संभावना सीमित दिखाई दे रही है। इसलिए निवेशकों, उद्योग जगत और आम लोगों की नजरें 5 जून को आने वाले RBI के फैसले पर टिकी हुई हैं।




