चंडीगढ़ नगर निगम में हाईमास्ट लाइट घोटाले का खुलासा, जेई की रिपोर्ट में गंभीर तकनीकी गड़बड़ियां उजागर

चंडीगढ़ नगर निगम में हाईमास्ट लाइट घोटाले का खुलासा, जेई की रिपोर्ट में गंभीर तकनीकी गड़बड़ियां उजागर

चंडीगढ़ नगर निगम में फर्जी एफडी मामले के बाद अब हाईमास्ट लाइट इंस्टॉलेशन को लेकर नया विवाद सामने आया है। शहर के कई इलाकों में लगाए गए हाईमास्ट पोल और लाइटिंग सिस्टम में गंभीर तकनीकी अनियमितताओं का खुलासा होने के बाद निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे अहम बात यह है कि यह मामला किसी बाहरी एजेंसी ने नहीं बल्कि खुद निगम के इलेक्ट्रिकल विंग के जूनियर इंजीनियर की रिपोर्ट के जरिए सामने आया है।

जांच रिपोर्ट में सेक्टर-34, सेक्टर-35 स्लो कैरिज-वे, सेक्टर-48 नाइट फूड स्ट्रीट और ओपन एयर थिएटर में लगाए गए हाईमास्ट सिस्टम की गुणवत्ता पर गंभीर आपत्तियां दर्ज की गई हैं। रिपोर्ट तैयार करने वाले जूनियर इंजीनियर सनी ठाकुर ने संबंधित एजेंसी के भुगतान पर रोक लगाने की सिफारिश करते हुए कई तकनीकी खामियों और दस्तावेजी गड़बड़ियों की ओर इशारा किया है।

गोदाम में कुछ और, साइट पर कुछ और!

रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल महीने में एजेंसी के गोदाम का निरीक्षण किया गया था, जहां से थर्ड पार्टी टेस्टिंग के लिए पाइपों के सैंपल भी लिए गए। लेकिन बाद में जब साइट पर लगे पोल और पाइपों की जांच हुई तो उनकी गुणवत्ता निरीक्षण के दौरान दिखाए गए सामान से अलग और काफी कमजोर पाई गई। जेई ने साफ तौर पर कहा कि निष्पक्ष जांच के लिए सैंपल सीधे इंस्टॉलेशन साइट से लिए जाने चाहिए।

निरीक्षण रिपोर्ट में जरूरी जानकारी गायब

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि मार्च 2026 में फैक्ट्री स्तर पर हाईमास्ट और केबल का निरीक्षण किया गया था, लेकिन इसकी जानकारी काफी देरी से साझा की गई। इससे भी बड़ा सवाल यह उठा कि निरीक्षण रिपोर्ट में हाईमास्ट, मोटर और डबल ड्रम विंच के मॉडल नंबर और सीरियल नंबर तक दर्ज नहीं किए गए। ऐसे में यह सत्यापित करना मुश्किल हो गया कि साइट पर लगाए गए उपकरण वही हैं जिनकी फैक्ट्री में जांच हुई थी या फिर बाद में सामग्री बदली गई।

एक महीने में जंग, वेल्डिंग में दरारें

सेक्टर-48 में लगाए गए हाईमास्ट पोलों की स्थिति को लेकर रिपोर्ट में कई गंभीर टिप्पणियां की गई हैं। गैल्वनाइजेशन की गुणवत्ता कमजोर होने के कारण पोलों पर बेहद कम समय में जंग के निशान दिखाई देने लगे। वेल्डिंग में दरारें, गैप, कटिंग दोष और पोरोसिटी जैसी तकनीकी कमियां भी सामने आईं। इसके अलावा ट्रेलिंग केबल मानकों के अनुरूप नहीं मिलीं और कुछ केबल अंडर गेज पाई गईं, जिससे भविष्य में सुरक्षा जोखिम बढ़ने की आशंका जताई गई है।

टेंडर शर्तों का भी उल्लंघन

जांच में यह भी सामने आया कि टेंडर में निर्धारित छह-पोल मोटर की जगह चार-पोल 1425 आरपीएम मोटर लगाई गई। कई जरूरी उपकरण जैसे मैकेनिकल टार्क लिमिटर, रबर बफर, प्रोटेक्टिव पीवीसी सिस्टम और मल्टी-पिन प्लग-सॉकेट भी मौके पर नहीं मिले। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या एजेंसी ने लागत बचाने के लिए निम्न गुणवत्ता वाला सामान इस्तेमाल किया।

वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल

मामले ने इसलिए और तूल पकड़ लिया है क्योंकि संबंधित कंपनी को काम देने से पहले निगम इंजीनियरिंग विभाग के वरिष्ठ अधिकारी West Bengal के हुगली स्थित कंपनी परिसर का दौरा कर चुके थे। अधिकारियों ने निरीक्षण के बाद संतोषजनक रिपोर्ट भी दी थी, जिसके आधार पर कंपनी को यह प्रोजेक्ट सौंपा गया। अब सवाल उठ रहे हैं कि जब प्रारंभिक निरीक्षण में सब कुछ ठीक पाया गया था तो साइट पर इतनी बड़ी तकनीकी गड़बड़ियां कैसे सामने आ गईं।

संयुक्त जांच की मांग

जूनियर इंजीनियर ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है कि वरिष्ठ अधिकारियों, तकनीकी विशेषज्ञों और निर्माता कंपनी के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में संयुक्त साइट निरीक्षण कराया जाए। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि जब तक सभी तकनीकी पहलुओं की जांच पूरी नहीं होती, तब तक एजेंसी का बिल पास करना उचित नहीं होगा।

इस खुलासे के बाद नगर निगम की खरीद प्रक्रिया, गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली और तकनीकी निगरानी पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। विपक्षी दलों और शहर के सामाजिक संगठनों ने पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराने और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग शुरू कर दी है।