चंडीगढ़ निगम में सफाई टेंडर को लेकर घमासान, पार्षदों और अफसरों के बीच तीखी बहस

चंडीगढ़ निगम में सफाई टेंडर को लेकर घमासान, पार्षदों और अफसरों के बीच तीखी बहस

चंडीगढ़ नगर निगम की बैठक में सफाई सेवाओं के टेंडर को लेकर जबरदस्त विवाद देखने को मिला। दक्षिणी सेक्टरों में जीआईएस आधारित मैकेनाइज्ड और मैनुअल सफाई व्यवस्था के ठेके पर पार्षदों और अधिकारियों के बीच खुलकर मतभेद सामने आए।

सदन में पार्षदों ने आरोप लगाया कि पिछली बैठक में सबसे कम बोली (एल-1) लगाने वाली कंपनी को काम देने का प्रस्ताव पारित किया गया था, लेकिन अधिकारियों ने उसे लागू करने के बजाय कंपनी को एक महीने की मोहलत दे दी। इस फैसले पर पार्षदों ने नाराजगी जताते हुए इसे सदन की अवहेलना बताया।

भाजपा पार्षदों ने सवाल उठाया कि जब सदन के निर्णयों को लागू ही नहीं किया जाना, तो बैठकों का औचित्य क्या रह जाता है। उन्होंने यह भी मांग की कि उस अधिकारी का नाम सामने लाया जाए, जिसने प्रस्ताव के क्रियान्वयन में बाधा डाली।

बैठक के दौरान माहौल इतना गरमा गया कि एक पार्षद बीच में ही बाहर जाने लगे, हालांकि अन्य सदस्यों ने उन्हें समझाकर रोक लिया। इसी दौरान अधिकारियों पर मिलीभगत के आरोप भी लगे, जिससे स्थिति और तनावपूर्ण हो गई। हालात को देखते हुए मेयर को बैठक स्थगित कर हस्तक्षेप करना पड़ा।

करीब दो घंटे बाद बैठक दोबारा शुरू हुई तो फिर से यही मुद्दा छाया रहा। निगम आयुक्त ने सफाई देते हुए कहा कि टेंडर प्रक्रिया अभी जारी है और एल-1 कंपनी को बाहर नहीं किया गया है। उन्होंने बताया कि कंपनी की दरों को लेकर स्पष्टीकरण मांगा गया है और कुछ तकनीकी कमियां सामने आई हैं, जिन पर चर्चा के बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा।

दिलचस्प बात यह रही कि लंच से पहले तक पार्षद एकजुट नजर आ रहे थे, लेकिन बाद में मतभेद उभरकर सामने आए। कुछ पार्षदों ने सवाल उठाया कि एक ही कंपनी का पक्ष क्यों लिया जा रहा है, जबकि अन्य ने सुझाव दिया कि निगम खुद अपने स्तर पर सफाई व्यवस्था संभाल सकता है।

टेंडर प्रक्रिया में कुल छह कंपनियों ने हिस्सा लिया था, जिनमें से दो ही तकनीकी रूप से योग्य पाई गईं। सबसे कम बोली करीब 5.93 करोड़ रुपये प्रतिमाह की थी, जो निगम के अनुमानित खर्च से काफी अधिक थी। इसी वजह से यह मुद्दा और अधिक विवादित बन गया।

फिलहाल, इस पूरे मामले में अंतिम निर्णय लंबित है, लेकिन निगम की बैठक में हुई तीखी बहस ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच खिंचाव को साफ तौर पर उजागर कर दिया है।