इंडियन नेशनल लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष अभय सिंह चौटाला ने केंद्र सरकार द्वारा धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में की गई बढ़ोतरी को किसानों के साथ अन्याय करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने किसानों की वास्तविक लागत को नजरअंदाज करते हुए बेहद मामूली बढ़ोतरी की है, जिससे देश के अन्नदाता को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा।
केंद्र सरकार ने आगामी खरीफ सीजन के लिए सामान्य धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2441 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया है। पिछले साल यह MSP 2369 रुपये प्रति क्विंटल था। यानी इस बार सिर्फ 72 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई है। अभय चौटाला का कहना है कि बढ़ती महंगाई, डीजल-पेट्रोल की कीमतें, खाद-बीज और मजदूरी लागत को देखते हुए यह वृद्धि बेहद कम है और किसानों की लागत तक पूरी नहीं कर पा रही।
उन्होंने कहा कि धान की कुल औसत लागत यानी सी-2 कॉस्ट लगभग 2162 रुपये प्रति क्विंटल बैठती है। यदि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार सी-2 लागत पर 50 प्रतिशत लाभ जोड़कर MSP तय किया जाए तो धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य करीब 3243 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए। लेकिन सरकार ने ए-2 प्लस एफएल फार्मूले के आधार पर MSP तय कर किसानों को वास्तविक लाभ से वंचित कर दिया।
अभय चौटाला ने आरोप लगाया कि मौजूदा MSP किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य देने में विफल है। उनके अनुसार सरकार की नीति के कारण किसानों को प्रति क्विंटल लगभग 802 रुपये का नुकसान झेलना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि जब खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, ऐसे समय में MSP में इतनी कम वृद्धि किसानों की आर्थिक स्थिति को और कमजोर करेगी।
इनेलो नेता ने कहा कि हरियाणा और पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्यों में किसान पहले ही मौसम की मार, बढ़ते कर्ज और उत्पादन लागत के दबाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में यदि फसलों के लाभकारी दाम नहीं मिलेंगे तो खेती करना और मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने केंद्र सरकार से MSP निर्धारण की नीति पर पुनर्विचार करने और किसानों को स्वामीनाथन आयोग के फार्मूले के अनुसार लाभकारी मूल्य देने की मांग की।
इस दौरान उन्होंने अपने पिता और पूर्व मुख्यमंत्री स्व. ओमप्रकाश चौटाला को याद करते हुए कहा कि वे हमेशा किसान और मजदूर को देश की असली ताकत मानते थे। अभय चौटाला ने कहा कि अगर समय रहते किसानों को मजबूत किया गया होता, खेती को उद्योगों के बराबर महत्व मिला होता और किसानों को सस्ती खाद, बीज, पानी व बिजली उपलब्ध करवाई गई होती, तो आज ग्रामीण अर्थव्यवस्था इतनी दबाव में नहीं होती।
उन्होंने दावा किया कि किसानों की आय दोगुनी करने के वादे अब जमीन पर दिखाई नहीं दे रहे हैं। MSP को लेकर किसानों में लगातार असंतोष बढ़ रहा है और आने वाले समय में यह मुद्दा बड़े राजनीतिक और किसान आंदोलन का रूप ले सकता है।


