एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती ताकत की लड़ाई के बीच अब अमेरिका ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिससे चीन की चिंता और गहरी हो सकती है। खबर है कि अमेरिका और इंडोनेशिया के बीच एक अहम रक्षा समझौता आकार ले रहा है, जिसके तहत अमेरिका को इंडोनेशिया के एयरस्पेस के इस्तेमाल की अनुमति मिल सकती है। वॉशिंगटन में हुई इस उच्चस्तरीय बैठक में अमेरिकी रक्षा मंत्री और इंडोनेशियाई राष्ट्रपति के बीच इस विषय पर चर्चा हुई, जिसे रणनीतिक तौर पर काफी अहम माना जा रहा है।
दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम का केंद्र है मलक्का स्ट्रेट, दुनिया के सबसे व्यस्त और संवेदनशील समुद्री मार्गों में से एक। यह जलडमरूमध्य हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर के जरिए प्रशांत महासागर से जोड़ता है। इसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां से गुजरने वाला समुद्री ट्रैफिक बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। खासकर चीन के लिए, क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर आता है।
चीन लंबे समय से इस रास्ते पर अपनी निर्भरता को लेकर चिंतित रहा है। करीब दो दशक पहले ही उसके नेतृत्व ने ‘मलक्का दुविधा’ का जिक्र करते हुए चेताया था कि अगर इस मार्ग को कभी रोका गया, तो देश की अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है। आज भी चीन का ज्यादातर तेल और गैस इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है, जिससे उसकी रणनीतिक कमजोरी साफ झलकती है।
इसी कमजोरी को ध्यान में रखते हुए अमेरिका अपनी रणनीति को और मजबूत कर रहा है। इंडोनेशिया के साथ बढ़ती सैन्य साझेदारी को सिर्फ सहयोग के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे एक बड़े रणनीतिक खेल का हिस्सा माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अमेरिका को हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर के बीच होने वाली गतिविधियों पर और ज्यादा नजर रखने का मौका मिलेगा।
अगर कभी क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तो ऐसी स्थिति में अमेरिका और उसके सहयोगी इस अहम समुद्री मार्ग को नियंत्रित कर सकते हैं। इससे चीन की सप्लाई चेन पर सीधा असर पड़ेगा और उसकी ऊर्जा आपूर्ति बाधित हो सकती है। यही कारण है कि अमेरिका अपनी नौसैनिक मौजूदगी को इन इलाकों में लगातार मजबूत कर रहा है।
समुद्री रास्तों को रणनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का विचार नया नहीं है। इतिहास में कई बार यह साबित हो चुका है कि जो देश समुद्री मार्गों और संकरे जलडमरूमध्यों पर नियंत्रण रखता है, वही वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। आज अमेरिका भी इसी रणनीति पर आगे बढ़ता दिख रहा है।
हालांकि, चीन ने इस चुनौती से निपटने के लिए कई वैकल्पिक रास्ते तैयार किए हैं। उसने रूस और मध्य एशिया से पाइपलाइन नेटवर्क खड़ा किया है, म्यांमार के जरिए ऊर्जा कॉरिडोर बनाया है और हिंद महासागर क्षेत्र में कई बंदरगाह विकसित किए हैं। इसके बावजूद समुद्री रास्तों की अहमियत कम नहीं हुई है, क्योंकि वे सस्ते और तेज़ हैं।
यही वजह है कि मलक्का स्ट्रेट आज भी चीन की ‘लाइफलाइन’ बना हुआ है। ऐसे में अगर अमेरिका और इंडोनेशिया के बीच यह रक्षा समझौता आगे बढ़ता है, तो यह एशिया की रणनीतिक राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है। चीन के लिए यह सिर्फ एक डील नहीं, बल्कि एक संभावित चुनौती बनकर उभर रही है, जो भविष्य में क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकती है।




