मध्य-पूर्व की कूटनीति में हालिया घटनाक्रम ने पाकिस्तान की भूमिका पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत को लेकर इस्लामाबाद ने जो पहल की, वह अंततः अधर में लटक गई। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफ कर दिया कि वह अमेरिकी प्रतिनिधियों से मुलाकात नहीं करेंगे, जिसके बाद प्रस्तावित दौरा रद्द करना पड़ा।
दरअसल, अमेरिका की ओर से डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल भेजने की तैयारी में था। माना जा रहा है कि पाकिस्तान ने ही यह भरोसा दिलाया था कि वह ईरान को बातचीत के लिए राजी कर लेगा।
इस बीच, पाकिस्तान की इस सक्रियता से उसका करीबी सहयोगी चीन असहज नजर आया। बिना सलाह लिए इस तरह की कूटनीतिक पहल करने पर बीजिंग ने नाराजगी जताई और पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार को तलब कर लिया। इसके बाद दोनों देशों के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर भी हुए, जिसमें अंतरराष्ट्रीय नियमों के पालन पर जोर दिया गया।
इस्लामाबाद में हुई शुरुआती बातचीत भी ज्यादा सफल नहीं रही थी। ईरान को अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का रवैया पसंद नहीं आया। बातचीत के दौरान बार-बार वॉशिंगटन से निर्देश लेना और साथ ही बेंजामिन नेतन्याहू से संपर्क करना ईरान को खटक गया। इसके तुरंत बाद अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर सख्त रुख अपनाया और क्षेत्र में तनाव बढ़ गया।
हालांकि पहली कोशिश नाकाम रहने के बावजूद पाकिस्तान पीछे नहीं हटा। सेना प्रमुख आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कई मुस्लिम देशों का दौरा कर समर्थन जुटाने की कोशिश की। इस दौरान भी चीन को दरकिनार किया गया, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में खटास की आशंका बढ़ गई।
ईरान के साथ पाकिस्तान की लंबी सीमा भी एक अहम मुद्दा है। लगभग 900 किलोमीटर की इस सीमा को लेकर ईरान सतर्क है कि कहीं इसका इस्तेमाल किसी बाहरी सैन्य कार्रवाई के लिए न हो। साथ ही पाकिस्तान द्वारा सऊदी अरब को सैनिक और संसाधन भेजना भी तेहरान के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
वास्तव में, ईरान इस समय वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्र बन चुका है। एक ओर अमेरिका है, जो चाहता है कि ईरान अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सीमित करे, वहीं दूसरी ओर चीन, जो संसाधनों तक अपनी पहुंच बनाए रखना चाहता है। परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल जैसे मुद्दे भले ही चर्चा में हों, लेकिन असली लड़ाई आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव की है।
इन हालात में अमेरिका को भी एक कूटनीतिक जीत की जरूरत महसूस हो रही है। तमाम दबावों के बावजूद ईरान को झुकाने में नाकाम रहने के बाद, वॉशिंगटन के लिए कोई भी सकारात्मक परिणाम महत्वपूर्ण हो गया है। ऐसे में पाकिस्तान की भूमिका अहम तो है, लेकिन उसका यह दोहरा खेल कहीं उसी के लिए मुश्किलें न खड़ी कर दे।




