आज यानी 27 अप्रैल 2026, सोमवार को मोहिनी एकादशी का पावन पर्व मनाया जा रहा है। यह व्रत हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आता है और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया था। इस कारण इस एकादशी को विशेष फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस दिन नियमपूर्वक व्रत रखते हैं और कथा का श्रवण करते हैं, उनके जीवन के कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि वैशाख शुक्ल एकादशी का क्या महत्व है और इसका व्रत किस प्रकार किया जाना चाहिए। इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें एक प्राचीन कथा सुनाई, जो महर्षि वशिष्ठ ने भगवान श्रीराम को बताई थी।
कथा के अनुसार, जब भगवान राम सीता जी के वियोग में अत्यंत दुखी थे, तब उन्होंने अपने गुरु वशिष्ठ से ऐसा व्रत बताने का आग्रह किया जिससे सभी दुखों और पापों का नाश हो सके। इस पर वशिष्ठ मुनि ने उन्हें मोहिनी एकादशी का महत्व समझाया और बताया कि यह व्रत मनुष्य को मोह-माया के बंधन से मुक्त कर सकता है।
इस कथा में एक प्राचीन नगर भद्रावती का उल्लेख आता है, जो सरस्वती नदी के किनारे बसा हुआ था। वहां द्युतिमान नाम के एक राजा राज्य करते थे। उसी नगर में धनपाल नाम का एक अत्यंत धर्मात्मा और दानी वैश्य रहता था, जिसने समाज के हित में अनेक धर्मशालाएं, कुएं और जलसेवा की व्यवस्थाएं करवाई थीं।
धनपाल के पांच पुत्र थे, लेकिन उनमें से एक पुत्र धृष्टबुद्धि अपने नाम के अनुरूप ही कुसंगति में पड़ गया। वह न तो धार्मिक आचरण करता था और न ही परिवार के संस्कारों का पालन करता था। जुआ, मद्यपान और बुरे लोगों की संगति में रहकर उसने अपने पिता की संपत्ति भी नष्ट कर दी। अंततः परेशान होकर उसके पिता ने उसे घर से निकाल दिया।
घर से बाहर आने के बाद उसकी स्थिति और भी खराब हो गई। धीरे-धीरे उसने अपने पास की सारी वस्तुएं बेच दीं और जब कोई सहारा नहीं बचा, तो चोरी करने लगा। कई बार पकड़े जाने के बाद उसे दंड भी मिला और अंततः उसे नगर से निकाल दिया गया।
वन में भटकते हुए वह जीव-हत्या कर अपना पेट भरने लगा। एक दिन वह अत्यंत भूखा-प्यासा होकर भटक रहा था कि उसे कौंडिन्य ऋषि का आश्रम दिखाई दिया। उस समय ऋषि गंगा स्नान कर लौट रहे थे। उनके भीगे वस्त्रों से गिरे जल के छींटे उस पर पड़े, जिससे उसके भीतर परिवर्तन की भावना जाग उठी।
पश्चाताप से भरे उस व्यक्ति ने ऋषि से अपने पापों से मुक्ति का उपाय पूछा। ऋषि ने उसे मोहिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी और बताया कि यह व्रत बिना किसी विशेष साधन के भी किया जा सकता है। उनके निर्देशानुसार उसने श्रद्धा से व्रत रखा।
कहा जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से उसके सारे पाप नष्ट हो गए और अंत में उसे विष्णु लोक की प्राप्ति हुई। यही कारण है कि मोहिनी एकादशी को अत्यंत प्रभावशाली और पुण्यदायी व्रत माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत की कथा सुनने या पढ़ने से भी व्यक्ति को महान पुण्य की प्राप्ति होती है, जो हजार गौदान के बराबर माना गया है। इसलिए इस दिन व्रत के साथ-साथ कथा का श्रवण विशेष रूप से लाभकारी माना गया है।




