हाल ही में आम आदमी पार्टी के कुछ राज्यसभा सदस्यों के दूसरी पार्टी में जाने की खबरों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या इस स्थिति में सांसद अपनी सदस्यता बरकरार रख सकते हैं या नहीं। राघव चड्ढा के दावों के बाद यह मुद्दा और चर्चा में आ गया है।
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, राज्यसभा के लिए निर्वाचित सदस्य को सीधे तौर पर उसकी पार्टी नहीं हटा सकती। हालांकि, दलबदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) के तहत कुछ परिस्थितियों में सदस्य को अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
नियमों के मुताबिक, यदि कोई सांसद अपनी पार्टी छोड़ता है या पार्टी के निर्देशों के खिलाफ वोट करता है, तो उसकी सदस्यता खत्म हो सकती है। लेकिन अगर किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सांसद एक साथ किसी दूसरी पार्टी में विलय का फैसला लेते हैं, तो यह दलबदल नहीं माना जाता और उनकी सदस्यता बनी रह सकती है।
बताया जा रहा है कि राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के कुल 10 सदस्य हैं, ऐसे में कम से कम 7 सांसदों का एक साथ विलय के पक्ष में होना जरूरी है। राघव चड्ढा ने दावा किया है कि उनके पास आवश्यक समर्थन है और इस संबंध में दस्तावेज भी राज्यसभा के सभापति को सौंपे गए हैं।
हालांकि, जिन अन्य सांसदों के नाम सामने आए हैं, उनकी ओर से अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है और अंतिम फैसला राज्यसभा के सभापति द्वारा लिया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे मामले में कानूनी प्रक्रिया और तथ्यों की जांच के बाद ही स्पष्ट होगा कि संबंधित सांसद अपनी सदस्यता बचा पाएंगे या नहीं।




