शिवालिक-कांडी बेल्ट में अवैध निर्माणों पर एनजीटी का बड़ा एक्शन, पंजाब के 5 जिलों के डीसी से मांगा पूरा हिसाब

शिवालिक-कांडी बेल्ट में अवैध निर्माणों पर एनजीटी का बड़ा एक्शन, पंजाब के 5 जिलों के डीसी से मांगा पूरा हिसाब

पंजाब के पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील शिवालिक और कांडी क्षेत्र में वर्षों से जारी निर्माण गतिविधियों पर अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपना लिया है। अधिकरण ने मोहाली, रूपनगर, नवांशहर, गुरदासपुर और पठानकोट के डिप्टी कमिश्नरों को तलब करते हुए उन सभी जमीनों का विस्तृत रिकॉर्ड पेश करने के निर्देश दिए हैं, जिन्हें पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम (पीएलपीए) के दायरे से बाहर किया गया था। मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को निर्धारित की गई है।

एनजीटी की यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब पंजाब सरकार की नई “लो इंपैक्ट ग्रीन हैबिटैट्स” (LIGH) नीति को लेकर पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। राज्य सरकार के हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट विभाग ने पिछले वर्ष 20 नवंबर को यह नीति अधिसूचित की थी। इस नीति के तहत पीएलपीए से बाहर की गई जमीनों पर पहले से मौजूद निर्माणों को नियमित करने और सीमित निर्माण गतिविधियों को अनुमति देने का प्रावधान किया गया।

हालांकि, इस नीति का विरोध करते हुए सार्वजनिक कार्रवाई समिति के प्रतिनिधि जसकीरत सिंह ने एनजीटी में याचिका दायर की। याचिका में आरोप लगाया गया कि सरकार पर्यावरणीय रूप से अति संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माणों को वैध बनाने का रास्ता खोल रही है, जिससे जंगलों और प्राकृतिक जल स्रोतों पर गंभीर असर पड़ सकता है।

याचिका में यह भी कहा गया कि जिन जमीनों को वर्ष 2005 के बाद पीएलपीए से बाहर किया गया था, उनका वास्तविक सीमांकन आज तक नहीं किया गया। वर्ष 2010 में पंजाब के तत्कालीन मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में यह तय हुआ था कि इन क्षेत्रों का सीमांकन राष्ट्रीय प्रतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (कैम्पा) फंड के जरिए कराया जाएगा, लेकिन डेढ़ दशक से अधिक समय गुजर जाने के बावजूद यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।

याचिकाकर्ता का दावा है कि इसी प्रशासनिक ढिलाई का फायदा उठाकर शिवालिक की तलहटी और कांडी बेल्ट में सैकड़ों फार्म हाउस, रिजॉर्ट, स्थायी इमारतें और अन्य व्यावसायिक ढांचे खड़े कर दिए गए। कई निर्माण ऐसे क्षेत्रों में किए गए, जहां सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और पंजाब इको-टूरिज्म नीति 2018 के तहत स्थायी निर्माण पर स्पष्ट रोक है।

सुनवाई के दौरान एनजीटी ने पांचों जिलों के डिप्टी कमिश्नरों को निर्देश दिए कि वे अगली तारीख से पहले विस्तृत एक्शन टेकन रिपोर्ट दाखिल करें। इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट करना होगा कि किन क्षेत्रों में निर्माण हुए, किस आधार पर अनुमति दी गई, कौन-कौन से निर्माण कथित रूप से अवैध हैं और उन्हें रोकने के लिए प्रशासन ने अब तक क्या कार्रवाई की।

मामले में एक और अहम तथ्य सामने आया कि जिन पांच जिलों में एलआईजीएच नीति लागू की गई है, वे पंजाब के कुल वन क्षेत्र का लगभग 68 प्रतिशत हिस्सा समेटे हुए हैं। ऐसे में पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन इलाकों में निर्माण गतिविधियों को नियमित किया गया तो राज्य के पहले से सीमित वन क्षेत्र और जैव विविधता पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। पंजाब में कुल वन क्षेत्र महज 3.67 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय मानक 33 प्रतिशत निर्धारित है।

गौरतलब है कि वर्ष 2005 में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद कुछ जमीनों को पीएलपीए से बाहर किया गया था। बाद में 2006 और 2009 में केंद्र के केंद्र के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से भी मंजूरी ली गई थी। लेकिन यह छूट केवल कृषि और आजीविका से जुड़ी सीमित जरूरतों के लिए थी। व्यावसायिक उपयोग और स्थायी निर्माण पर स्पष्ट प्रतिबंध लगाया गया था।

अब एनजीटी के हस्तक्षेप के बाद पंजाब सरकार की नई नीति, डिलिस्टेड जमीनों पर खड़े निर्माणों और प्रशासनिक भूमिका को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। माना जा रहा है कि डीसी की रिपोर्ट आने के बाद मामले में और कड़े निर्देश जारी हो सकते हैं, जिससे कई निर्माण परियोजनाओं, भूमि उपयोग मामलों और रियल एस्टेट गतिविधियों पर बड़ा असर पड़ सकता है।