मणिपुर-मिजोरम से इजरायल तक: कौन हैं ‘बनी मेनाशे’ और क्यों हो रहा है उनका पुनर्वास?

मणिपुर-मिजोरम से इजरायल तक: कौन हैं ‘बनी मेनाशे’ और क्यों हो रहा है उनका पुनर्वास?

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों मणिपुर और मिजोरम से जुड़े एक अनोखे समुदाय ‘बनी मेनाशे’ इन दिनों चर्चा में हैं। इजरायल सरकार इन्हें अपने देश में बसाने के लिए एक विशेष अभियान चला रही है, जिसे ‘ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन’ नाम दिया गया है। इस पहल के तहत हाल ही में करीब 250 लोगों को इजरायल ले जाया गया है, और आने वाले वर्षों में हजारों लोगों के पुनर्वास की योजना बनाई गई है।

इजरायल का खास मिशन और भविष्य की योजना

यह अभियान कोई नया नहीं है, बल्कि पिछले तीन दशकों से लगातार जारी है। अब तक 4000 से ज्यादा बनी मेनाशे लोग इजरायल में बस चुके हैं, जबकि हजारों लोग अभी भी इस प्रक्रिया का इंतजार कर रहे हैं। इजरायल की योजना है कि 2030 तक इस समुदाय के अधिकांश लोगों को वहां बसाया जाए। इस पूरी प्रक्रिया में ‘ज्यूइश एजेंसी फॉर इजरायल’ की अहम भूमिका है, जो आवास, प्रशिक्षण और धार्मिक प्रक्रियाओं में मदद करती है।

बनी मेनाशे: इतिहास और पहचान

‘बनी मेनाशे’ शब्द का अर्थ होता है ‘मेनाशे की संतान’। यह समुदाय खुद को प्राचीन इजरायल के ‘मेनाशे कबीले’ का वंशज मानता है, जो बाइबल में वर्णित 12 जनजातियों में से एक था। इतिहास के अनुसार, लगभग 2700 साल पहले असीरियाई आक्रमण के बाद 10 जनजातियां बिखर गई थीं, जिन्हें ‘लॉस्ट ट्राइब्स ऑफ इजरायल’ कहा जाता है। बनी मेनाशे उन्हीं में से एक माने जाते हैं।

लंबा प्रवास: इजरायल से भारत तक

इस समुदाय के पूर्वजों ने सदियों तक कई क्षेत्रों—फारस, अफगानिस्तान, तिब्बत और चीन—में भटकते हुए जीवन बिताया। करीब 400 साल पहले वे भारत के पूर्वोत्तर हिस्सों में आकर बस गए। यहां रहते हुए भी उन्होंने कई यहूदी परंपराओं जैसे खतना और धार्मिक नियमों को बनाए रखा।

धार्मिक बदलाव और नई पहचान

समय के साथ यह समुदाय ईसाई धर्म की ओर मुड़ गया था, लेकिन 20वीं सदी के मध्य में एक धार्मिक जागरण हुआ। 1950 के दशक में एक स्थानीय धार्मिक नेता के सपने और बाद में बाइबल से जुड़ाव ने लोगों को अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया। 1970 और 80 के दशक में यहूदी धर्म को फिर से अपनाने का आंदोलन तेज हुआ, जिसमें इजरायली धार्मिक गुरुओं ने भी सहयोग किया।

इजरायल पहुंचने के बाद क्या होता है?

हालांकि ये लोग खुद को यहूदी मानते हैं, लेकिन इजरायल पहुंचने पर इन्हें औपचारिक ‘ऑर्थोडॉक्स कन्वर्जन’ प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके बाद ही उन्हें वहां नागरिकता और अन्य सुविधाएं मिलती हैं। उन्हें हिब्रू भाषा सिखाई जाती है और समाज में घुलने-मिलने के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है।

रोजगार और बसावट

इजरायल में ये लोग मुख्य रूप से निर्माण कार्य, ड्राइविंग और अन्य श्रम आधारित क्षेत्रों में काम करते हैं। वर्तमान में इजरायल श्रमिकों की कमी से जूझ रहा है, ऐसे में यह समुदाय उस कमी को पूरा करने में मददगार साबित हो रहा है। इन्हें कई बार संवेदनशील इलाकों जैसे गाजा या लेबनान सीमा के पास भी बसाया जाता है।

भारत छोड़ने के कारण

पूर्वोत्तर भारत के दूरदराज क्षेत्रों में आर्थिक अवसरों की कमी और यहूदी धार्मिक ढांचे का अभाव इस पलायन की बड़ी वजह है। इजरायल में बेहतर रोजगार, उच्च आय और अपनी धार्मिक पहचान को पूरी तरह जीने का मौका उन्हें आकर्षित करता है।

सांस्कृतिक जुड़ाव और स्थानीय पहचान

भारत में इन्हें ‘शिनलुंग’ नाम से भी जाना जाता है और ये कुकी-चिन-मिजो समुदायों से जुड़े हैं। इनकी पारंपरिक मान्यताओं और बाइबल की कहानियों में समानता ने इन्हें अपने यहूदी मूल पर विश्वास करने के लिए प्रेरित किया।

‘बनी मेनाशे’ समुदाय की कहानी सिर्फ पलायन की नहीं, बल्कि पहचान, आस्था और अपनी जड़ों की तलाश की कहानी है। इजरायल का यह पुनर्वास कार्यक्रम एक ओर जहां ऐतिहासिक संबंधों को पुनर्जीवित करने का प्रयास है, वहीं दूसरी ओर यह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।