मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर अब भारत के एविएशन सेक्टर पर साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के चलते एयरलाइंस का खर्च अचानक बढ़ गया है, जिससे कंपनियों के लिए रोज़मर्रा का संचालन संभालना मुश्किल हो रहा है। इंडिगो, एयर इंडिया और स्पाइसजेट जैसी कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस (FIA) ने सरकार को चेतावनी दी है कि हालात जल्द नहीं सुधरे तो उड़ानों में कटौती करनी पड़ सकती है।
दरअसल, पिछले कुछ महीनों में कच्चा तेल करीब 45% तक महंगा हो चुका है। इसका सीधा असर एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) पर पड़ा है, जो एयरलाइंस के खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा होता है। पहले जहां कुल ऑपरेशनल लागत में फ्यूल की हिस्सेदारी लगभग 40% थी, अब यह बढ़कर करीब 60% तक पहुंच गई है।
हालांकि सरकार ने घरेलू उड़ानों के लिए ATF की कीमतों में बढ़ोतरी को सीमित रखने की कोशिश की है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर इसका असर ज्यादा देखने को मिला है। आंकड़ों के मुताबिक इंटरनेशनल ऑपरेशंस के लिए फ्यूल कीमतों में भारी उछाल आया है, जिससे एयरलाइंस का वित्तीय संतुलन बिगड़ रहा है।
इसी वजह से एयरलाइंस कंपनियों ने सरकार से टैक्स में राहत देने की मांग की है। FIA ने सुझाव दिया है कि ATF पर लगने वाली 11% एक्साइज ड्यूटी को फिलहाल हटाया जाए और राज्यों द्वारा वसूले जाने वाले वैट में भी कमी की जाए। साथ ही, 2022 में लागू किया गया ‘क्रूड ब्रेंट प्राइसिंग मैकेनिज्म’ फिर से शुरू करने की मांग भी की गई है, ताकि कीमतों में कुछ स्थिरता लाई जा सके।
एयरलाइंस का कहना है कि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय फ्यूल कीमतों के बीच बढ़ता अंतर उनके नेटवर्क को अस्थिर बना रहा है। अगर जल्द राहत नहीं मिली, तो कंपनियों को अपनी क्षमता घटानी पड़ेगी, जिसका असर यात्रियों और देश की कनेक्टिविटी पर पड़ेगा।
वहीं, सरकार भी स्थिति पर नजर बनाए हुए है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने अप्रैल 2026 से तीन महीने के लिए लैंडिंग और पार्किंग चार्ज में 25% की कटौती की है। इसके अलावा, एयरलाइंस को आर्थिक राहत देने के लिए करीब 5,000 करोड़ रुपये के इमरजेंसी क्रेडिट पैकेज पर भी विचार किया जा रहा है।
फिलहाल, ATF की कीमतों में अंतर साफ नजर आ रहा है, जहां घरेलू फ्यूल बढ़ोतरी को सीमित रखा गया, वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतें काफी तेजी से बढ़ी हैं। ग्लोबल मार्केट में ATF के दाम 87 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 235 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुके हैं, और एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले समय में यह दबाव और बढ़ सकता है।




