30 अप्रैल को सिख पंथ के तीसरे गुरु, श्री गुरु अमरदास जी का पावन प्रकाश पर्व पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। यह दिन केवल एक धार्मिक अवसर ही नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और समानता के संदेश को याद करने का भी महत्वपूर्ण क्षण है।
श्री गुरु अमरदास जी का जन्म वैशाख शुक्ल एकादशी, संवत 1536 विक्रमी में अमृतसर के समीप बासरके गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री तेजभान और माता का नाम लखमी जी था। प्रारंभिक जीवन में वे खेती-बाड़ी और व्यापार में लगे रहते थे, लेकिन उनके मन में ईश्वर भक्ति की गहरी लगन थी। यही कारण था कि लोग उन्हें श्रद्धापूर्वक ‘भक्त अमरदास’ के नाम से पुकारते थे।
उनकी आध्यात्मिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्होंने अपनी पुत्रवधू से गुरु नानक देव जी द्वारा रचित एक पवित्र शबद सुना। इस शबद ने उनके मन पर इतना गहरा प्रभाव डाला कि उन्होंने तुरंत गुरु अंगद देव जी की शरण ग्रहण करने का निर्णय लिया। 61 वर्ष की आयु में उन्होंने गुरु अंगद देव जी को अपना गुरु बनाया और पूरे समर्पण के साथ लगभग 11 वर्षों तक सेवा की। उनकी निष्ठा और समर्पण से प्रभावित होकर गुरु अंगद देव जी ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया, जिसके बाद वे सिखों के तीसरे गुरु बने।
उस दौर में भारतीय समाज कई तरह की सामाजिक कुरीतियों से जकड़ा हुआ था। जात-पात, ऊंच-नीच, छुआछूत, सती प्रथा और कन्या हत्या जैसी बुराइयां आम थीं। ऐसे समय में गुरु अमरदास जी ने समाज में व्याप्त इन बुराइयों के खिलाफ एक सशक्त अभियान चलाया।
उन्होंने समानता और भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए ‘लंगर प्रथा’ को और मजबूती दी। गुरु जी ने यह नियम बनाया कि कोई भी व्यक्ति उनके दर्शन करने से पहले लंगर में पंगत में बैठकर भोजन करेगा, चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग से हो। इस परंपरा ने समाज में फैले भेदभाव को खत्म करने में अहम भूमिका निभाई। यहां तक कि मुगल सम्राट अकबर भी जब गोइंदवाल साहिब पहुंचे, तो उन्होंने भी आम संगत के साथ पंगत में बैठकर लंगर ग्रहण किया।
छुआछूत की भावना को समाप्त करने के उद्देश्य से गुरु जी ने गोइंदवाल साहिब में ‘सांझी बावली’ का निर्माण करवाया, जहां हर वर्ग के लोग बिना किसी भेदभाव के पानी का उपयोग कर सकते थे। यह उस समय के लिए एक क्रांतिकारी कदम था।
महिलाओं के सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए भी गुरु अमरदास जी ने महत्वपूर्ण प्रयास किए। उन्होंने सती प्रथा जैसी अमानवीय प्रथा का कड़ा विरोध किया और अपने उपदेशों में इसे नारी के अस्तित्व के खिलाफ बताया। ‘वार सूही’ के माध्यम से उन्होंने इस कुप्रथा के खिलाफ अपनी स्पष्ट और सशक्त आवाज उठाई। इतिहासकारों के अनुसार, वे सती प्रथा के विरुद्ध खुलकर आवाज उठाने वाले शुरुआती समाज सुधारकों में से एक थे।
आज, जब समाज समानता और न्याय की दिशा में आगे बढ़ रहा है, गुरु अमरदास जी के विचार और शिक्षाएं पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति केवल ईश्वर की आराधना में ही नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त अन्याय और भेदभाव को समाप्त करने के प्रयासों में भी निहित है।
प्रकाश पर्व के इस पावन अवसर पर देशभर के गुरुद्वारों में विशेष दीवान सजाए जा रहे हैं, जहां संगत गुरु जी की शिक्षाओं को स्मरण कर मानवता और सेवा के मार्ग पर चलने का संकल्प ले रही है।




