हिमाचल के सोलन नगर निगम चुनाव में उस वक्त बड़ा उलटफेर देखने को मिला, जब नामांकन पत्रों की जांच के दौरान भाजपा प्रत्याशी समेत तीन उम्मीदवारों के पर्चे रद्द कर दिए गए। इस फैसले ने चुनावी गणित को पूरी तरह बदल दिया है और कई वार्डों में मुकाबले का स्वरूप नया रूप लेता नजर आ रहा है।
नामांकन जांच में बड़ा एक्शन
नगर निगम चुनाव के लिए कुल 55 नामांकन दाखिल किए गए थे, जिनकी जांच के बाद 52 को सही पाया गया, जबकि तीन नामांकन निरस्त कर दिए गए। इनमें एक भाजपा प्रत्याशी और दो निर्दलीय उम्मीदवार शामिल हैं।
भाजपा के वार्ड-3 से उम्मीदवार पीयूष गर्ग का नामांकन सरकारी जमीन पर अतिक्रमण की शिकायत के आधार पर रद्द हुआ। इसके अलावा वार्ड-10 से भाजपा से नाराज होकर निर्दलीय मैदान में उतरे विवेक डोभाल और वार्ड-8 के एक अन्य निर्दलीय उम्मीदवार का नामांकन भी दस्तावेजी खामियों के कारण खारिज कर दिया गया।
भाजपा को बड़ा नुकसान
इस घटनाक्रम से भाजपा को सबसे बड़ा झटका वार्ड-3 में लगा है, जहां अब पार्टी का कोई अधिकृत उम्मीदवार मैदान में नहीं बचा। चौंकाने वाली बात यह है कि भाजपा ने यहां कोई कवरिंग कैंडिडेट भी नहीं उतारा था, जिसके चलते पार्टी को यह वार्ड बिना लड़े ही गंवाना पड़ा।
हालांकि, इसी वार्ड से पार्टी के नाराज कार्यकर्ता गौरव भारद्वाज ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन किया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा उन्हें अप्रत्यक्ष समर्थन देती है या किसी अन्य उम्मीदवार के साथ रणनीति बनाती है।
चुनावी समीकरण बदलने के संकेत
17 वार्डों में अब कुल 52 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें भाजपा और कांग्रेस के 34 उम्मीदवारों के अलावा 18 निर्दलीय शामिल हैं। कई वार्डों में दोनों प्रमुख दलों के बागी नेता निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं, जिससे मुकाबला और भी दिलचस्प हो गया है।
नाम वापसी पर टिकी नजरें
अब सभी की निगाहें 6 मई को होने वाली नाम वापसी प्रक्रिया पर टिकी हैं। इसके बाद ही अंतिम तस्वीर साफ होगी कि कितने उम्मीदवार मैदान में रहेंगे और किन वार्डों में सीधी टक्कर देखने को मिलेगी।
बागियों की भूमिका अहम
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव में बागी उम्मीदवार निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों के असंतुष्ट नेता निर्दलीय के रूप में मैदान में हैं, जो वोटों के बंटवारे को प्रभावित कर सकते हैं।
आगे क्या?
सोलन नगर निगम चुनाव अब पहले से ज्यादा रोचक हो गया है। भाजपा के लिए यह स्थिति एक चुनौती के रूप में सामने आई है, जबकि कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवार इसे अवसर के तौर पर देख रहे हैं।
नामांकन रद्द होने की इस घटना ने साफ कर दिया है कि इस बार चुनाव केवल पार्टी बनाम पार्टी नहीं, बल्कि रणनीति, संगठन और स्थानीय समीकरणों की भी परीक्षा होने वाला है।



