पंजाब में भ्रष्टाचार और सरकारी तंत्र में सक्रिय बिचौलियों को लेकर एक और बड़ा मामला सामने आया है। केंद्रीय इंवेस्टिगेशन ब्यूरो की जांच में ऐसे संकेत मिले हैं कि पंजाब विजिलेंस से जुड़े कुछ मामलों में शिकायतों को दबाव बनाने और कथित वसूली के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था। जांच एजेंसियों को शक है कि सरकारी विभागों के भीतर मौजूद कुछ लोग और बाहरी दलाल मिलकर अधिकारियों को डराने, फंसाने और समझौते के नाम पर रकम मांगने का नेटवर्क चला रहे थे।
सूत्रों के अनुसार, इस पूरे मामले की जांच अब सिर्फ रिश्वतखोरी तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक संगठित “प्रेशर एंड सेटलमेंट सिस्टम” के रूप में सामने आ रही है। आरोप है कि पहले किसी अधिकारी के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई जाती थी, फिर उसे कार्रवाई का डर दिखाकर बिचौलियों के जरिए संपर्क किया जाता था। इसके बाद मामला रफा-दफा कराने या फाइल बंद करवाने के नाम पर पैसों की मांग की जाती थी।
मामले ने उस समय नया मोड़ लिया जब निलंबित डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर की गिरफ्तारी के बाद पोस्टिंग और ट्रांसफर नेटवर्क से जुड़े कई खुलासे सामने आए। जांच एजेंसियों को संदेह है कि कुछ दलाल अफसरों तक सीधी पहुंच होने का दावा करते थे और उसी प्रभाव का इस्तेमाल करके अधिकारियों व कर्मचारियों पर दबाव बनाया जाता था।
अब ताजा विजिलेंस रिश्वत प्रकरण में विजिलेंस मुख्यालय से जब्त सीसीटीवी फुटेज जांच की अहम कड़ी बन गई है। बताया जा रहा है कि मोहाली स्थित मुख्यालय की रिकॉर्डिंग में शिकायतकर्ता एक्साइज एंड टैक्सेशन ऑफिसर अमित कुमार 29 अप्रैल को दफ्तर पहुंचते दिखाई दिए। जांच एजेंसियों के मुताबिक उन्हें पहले गेस्ट रूम में बैठाया गया और बाद में डीजीपी विजिलेंस के रीडर इंस्पेक्टर ओपी राणा के कमरे में ले जाया गया, जहां लंबी बातचीत हुई।
सूत्रों के अनुसार शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि उसे उसके खिलाफ दर्ज शिकायत दिखाई गई और कहा गया कि यदि “मामला शांत” करवाना है तो रकम देनी होगी। इसी के बाद सीबीआई का फोकस उस नेटवर्क पर गया, जिसमें विभागीय जानकारी बाहर लीक होने और फिर उसका इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए किए जाने की आशंका जताई जा रही है।
जांच एजेंसियों को राघव गोयल नामक व्यक्ति के मोबाइल फोन से भी कई महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य मिले हैं। इनमें कथित बातचीत, संदेश और संपर्कों का रिकॉर्ड शामिल बताया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि शिकायतकर्ता को भरोसा दिलाने के लिए विभागीय अधिकारियों से हुई बातचीत भी दिखाई गई थी, ताकि उसे यह महसूस कराया जा सके कि मामला गंभीर है और कार्रवाई कभी भी हो सकती है।
सीबीआई अब यह भी जांच कर रही है कि अमित कुमार के खिलाफ दर्ज मूल शिकायत असली थी या सिर्फ दबाव बनाने के उद्देश्य से तैयार की गई थी। यदि शिकायत फर्जी साबित होती है, तो मामला साधारण रिश्वतखोरी से कहीं बड़ा माना जाएगा। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह “डर पैदा करो और फिर समझौता करवाओ” मॉडल हो सकता है, जिसमें पहले अधिकारी को जांच, गिरफ्तारी या आय से अधिक संपत्ति के केस का भय दिखाया जाता था और फिर बिचौलियों के जरिए राहत दिलाने का प्रस्ताव रखा जाता था।
सूत्रों के मुताबिक शिकायतकर्ता को यह भी कहा गया था कि यदि समय रहते पैसे नहीं दिए गए तो उसके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज कर दिया जाएगा, जिससे उसका करियर खत्म हो सकता है। बताया जा रहा है कि लगातार दबाव और मानसिक तनाव के बाद उसने सीबीआई से संपर्क किया और पूरी शिकायत दर्ज करवाई।
इस पूरे घटनाक्रम ने पंजाब के प्रशासनिक ढांचे और विजिलेंस सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भी यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं बल्कि सरकारी तंत्र के भीतर संगठित प्रभाव और डर के जरिए चलाए जा रहे एक बड़े नेटवर्क का खुलासा हो सकता है।
फिलहाल सीबीआई विभिन्न डिजिटल रिकॉर्ड, कॉल डिटेल्स, सीसीटीवी फुटेज और विभागीय दस्तावेजों की गहन जांच कर रही है। आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।




