पंजाब विजिलेंस ब्यूरो में कथित भ्रष्टाचार और अंदरूनी गठजोड़ को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। Central Bureau of Investigation की जांच में सामने आया है कि रिश्वतखोरी मामले में फरार चल रहा इंस्पेक्टर ओपी राणा आधिकारिक रिकॉर्ड में डीजीपी विजिलेंस का रीडर ही नहीं था, जबकि लंबे समय से वह इसी हैसियत से काम करता रहा।
सूत्रों के अनुसार, हाल ही में 13 लाख रुपये की कथित रिश्वत मांगने के मामले में सीबीआई ने तीन बिचौलियों को गिरफ्तार किया था। जांच एजेंसी का दावा है कि इस पूरे नेटवर्क में इंस्पेक्टर ओपी राणा की अहम भूमिका थी, जो डीजीपी विजिलेंस के नाम पर लोगों से पैसे मांगने के आरोपों में घिरा हुआ है। हालांकि कार्रवाई के दौरान वह एजेंसियों को चकमा देकर फरार हो गया।
जांच के दौरान सबसे बड़ा खुलासा यह हुआ कि ओपी राणा की डीजीपी विजिलेंस कार्यालय में रीडर के तौर पर कोई आधिकारिक पोस्टिंग या ट्रांसफर आदेश मौजूद नहीं है। सीबीआई को मिले रिकॉर्ड के मुताबिक, आखिरी बार वर्ष 2020 में जब Sharad Satya Chauhan ट्रैफिक विंग में एडीजीपी थे, तब ओपी राणा को उनके रीडर के रूप में नियुक्त किया गया था।
लेकिन बाद में जब शरद सत्य चौहान विजिलेंस विभाग में डीजीपी बने, तब भी ओपी राणा उसी प्रभावशाली भूमिका में काम करता रहा। जांच एजेंसियों को अब तक ऐसा कोई सरकारी दस्तावेज नहीं मिला है, जिससे यह साबित हो सके कि उसे आधिकारिक रूप से इस संवेदनशील पद पर तैनात किया गया था। इसी वजह से अब यह सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर किसके संरक्षण में वह विजिलेंस मुख्यालय में इतनी अहम भूमिका निभाता रहा।
सीबीआई अब इस पूरे मामले की गहराई से जांच कर रही है। एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि क्या विभाग के भीतर कुछ वरिष्ठ अधिकारियों या प्रभावशाली लोगों की मदद से ओपी राणा को अनौपचारिक तौर पर अधिकार दिए गए थे। जांच एजेंसी को शक है कि इस नेटवर्क का इस्तेमाल विभागीय मामलों में दखल देने, सूचनाएं लीक करने और आर्थिक लाभ कमाने के लिए किया जा रहा था।
जांच में यह भी सामने आया है कि ओपी राणा कथित तौर पर विजिलेंस विभाग से जुड़ी गोपनीय जानकारी निजी व्यक्तियों और बिचौलियों तक पहुंचाता था। बदले में उससे जुड़े लोगों को भारी रकम और अन्य आर्थिक फायदे मिलने के आरोप हैं। सीबीआई के हाथ कुछ महत्वपूर्ण डिजिटल सबूत लगे हैं, जिनमें व्हाट्सएप चैट, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और अन्य इलेक्ट्रॉनिक डेटा शामिल हैं।
इन दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड के आधार पर एजेंसी ने दावा किया है कि ओपी राणा ने राघव गोयल और विकास गोयल नामक बिचौलियों के साथ मिलकर विजिलेंस विभाग के भीतर एक कथित नेटवर्क तैयार कर रखा था। यह नेटवर्क कथित तौर पर मामलों की जानकारी लीक करने, जांच प्रभावित करने और लोगों से पैसे वसूलने जैसे कामों में सक्रिय था।
इस बीच, सीबीआई की विशेष अदालत ओपी राणा की अग्रिम जमानत याचिका पहले ही खारिज कर चुकी है। एजेंसी की कई टीमें उसकी तलाश में लगातार छापेमारी कर रही हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे हो सकते हैं, क्योंकि जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि विभाग के भीतर इस पूरे कथित भ्रष्ट तंत्र को किस स्तर तक संरक्षण मिला हुआ था।




