कभी चौड़ी सड़कों, खुली हरियाली और सुनियोजित सेक्टरों के लिए दुनिया भर में सराहा जाने वाला चंडीगढ़ अब तेजी से बढ़ते वाहनों के बोझ तले दबता जा रहा है। जिस शहर को फ्रांसीसी वास्तुकार Le Corbusier ने बेहद सुव्यवस्थित और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया था, वहीं आज पार्किंग की समस्या सबसे बड़ी शहरी चुनौती बनती जा रही है। हालत यह है कि शहर में हर तीन मिनट में एक नई कार सड़क पर उतर रही है और पार्किंग के लिए जमीन लगातार कम पड़ती जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जिस चंडीगढ़ को करीब पांच लाख आबादी के हिसाब से विकसित किया गया था, वहां अब जनसंख्या 12 लाख के पार पहुंच चुकी है। ट्राइसिटी क्षेत्र — जिसमें Chandigarh, Mohali और Panchkula शामिल हैं — में आबादी और वाहनों की संख्या लगातार तेजी से बढ़ रही है। अनुमान है कि वर्ष 2051 तक केवल चंडीगढ़ की आबादी 23 लाख तक पहुंच सकती है, जबकि पूरे ट्राइसिटी क्षेत्र की जनसंख्या 45 लाख के आसपास हो सकती है।
दो महीने में खत्म हो रही नई नंबर सीरीज
वाहनों की बढ़ती संख्या का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 10 हजार नंबरों की नई वाहन सीरीज महज दो महीने में समाप्त हो रही है। शहर देश में प्रति व्यक्ति कार घनत्व के मामले में शीर्ष शहरों में शामिल हो चुका है। बढ़ती समृद्धि और बेहतर आय ने लोगों को निजी वाहनों की ओर आकर्षित किया है, लेकिन इसके अनुपात में पार्किंग और सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी।
फुटपाथ, ग्रीन बेल्ट और साइकिल ट्रैक तक कब्जे में
शहर के लगभग हर व्यस्त इलाके में पार्किंग का संकट साफ दिखाई देता है। सेक्टर मार्केट, सरकारी दफ्तर, अस्पताल, अदालतें और रिहायशी कॉलोनियां सभी वाहन दबाव से जूझ रही हैं। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि फुटपाथ, ग्रीन बेल्ट, साइकिल ट्रैक और पार्कों के किनारे तक पार्किंग स्थल में बदल चुके हैं।
Punjab and Haryana High Court और जिला अदालत परिसर के बाहर वाहनों की लंबी कतारें आम दृश्य बन चुकी हैं। कई स्थानों पर दोहरी और तिहरी लाइन में गाड़ियां खड़ी होने से ट्रैफिक जाम की स्थिति बनी रहती है।
रिहायशी इलाकों में सबसे ज्यादा परेशानी
घनी आबादी वाले सेक्टरों और कॉलोनियों में स्थिति और अधिक गंभीर हो चुकी है। पहले जहां परिवारों के पास एक-दो दोपहिया वाहन होते थे, वहीं अब अधिकांश घरों में एक से अधिक कारें हैं। लेकिन पुराने सेक्टरों और कॉलोनियों में पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण लोग पार्कों, खाली जगहों और सड़कों पर वाहन खड़े करने को मजबूर हैं।
कई छोटे पार्क अब अनौपचारिक पार्किंग स्थल बन चुके हैं। बच्चों के खेलने और लोगों के घूमने के लिए बनाई गई हरित जगहों पर अब वाहनों की कतारें दिखाई देती हैं। इससे न केवल पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित हो रहा है, बल्कि लोगों के लिए सार्वजनिक स्थान भी सिमटते जा रहे हैं।
प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती
शहरी योजनाकारों और ट्रैफिक विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले वर्षों में मल्टीलेवल पार्किंग, स्मार्ट पार्किंग सिस्टम और मजबूत सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था विकसित नहीं की गई तो स्थिति और भयावह हो सकती है। शहर में मेट्रो, इलेक्ट्रिक बसों और पार्क-एंड-राइड जैसी योजनाओं पर लंबे समय से चर्चा हो रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी तक अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल नई पार्किंग बनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि निजी वाहनों के उपयोग को कम करने के लिए सार्वजनिक परिवहन को अधिक सुविधाजनक और भरोसेमंद बनाना होगा।
भविष्य को लेकर बढ़ी चिंता
तेजी से बढ़ते वाहन दबाव ने चंडीगढ़ की मूल पहचान और नियोजित स्वरूप पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। कभी “सिटी ब्यूटीफुल” के नाम से पहचाने जाने वाले शहर में अब ट्रैफिक जाम, अवैध पार्किंग और सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण जैसी समस्याएं आम होती जा रही हैं।
यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में चंडीगढ़ को पार्किंग और ट्रैफिक प्रबंधन के सबसे बड़े शहरी संकटों में से एक का सामना करना पड़ सकता है।



