चंडीगढ़ की धरोहर पर विदेशों की नजर, अमेरिका में होने वाली नीलामी रोकने के लिए केंद्र से गुहार

चंडीगढ़ की धरोहर पर विदेशों की नजर, अमेरिका में होने वाली नीलामी रोकने के लिए केंद्र से गुहार

चंडीगढ़ की विश्वप्रसिद्ध वास्तुकला और उससे जुड़ी ऐतिहासिक धरोहर एक बार फिर चर्चा में है। शहर की पहचान माने जाने वाले दुर्लभ फर्नीचर और विरासत वस्तुओं की अमेरिका में प्रस्तावित नीलामी को लेकर चिंता बढ़ गई है। इस मामले में हेरिटेज आइटम्स प्रोटेक्शन कमेटी (HIPC) ने केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुए इसे देश की सांस्कृतिक संपदा से जुड़ा गंभीर विषय बताया है।

कमेटी के सदस्य एवं वरिष्ठ अधिवक्ता अजय जग्गा ने केंद्रीय विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को पत्र भेजकर अमेरिका में 4 जून को प्रस्तावित नीलामी पर रोक लगाने के लिए राजनयिक स्तर पर कार्रवाई करने की अपील की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो भारत की महत्वपूर्ण विरासत स्थायी रूप से विदेशी निजी संग्रहों का हिस्सा बन सकती है।

जानकारी के अनुसार अमेरिका स्थित प्रतिष्ठित नीलामी संस्था राइट ऑक्शन हाउस द्वारा चंडीगढ़ कैपिटल प्रोजेक्ट से जुड़े कई ऐतिहासिक फर्नीचर आइटम बिक्री के लिए सूचीबद्ध किए गए हैं। इन वस्तुओं को प्रसिद्ध स्विस-फ्रांसीसी वास्तुकार ले कोर्बुजिए के सहयोगी और चंडीगढ़ की स्थापत्य पहचान को आकार देने वाले वास्तुकार पियरे जेनरे ने डिजाइन किया था। ये फर्नीचर पंजाब यूनिवर्सिटी, सेंट्रल लाइब्रेरी, एमएलए फ्लैट्स और विभिन्न सरकारी संस्थानों में उपयोग किए जाते रहे हैं।

नीलामी में शामिल वस्तुओं में डाइनिंग टेबल सेट, डाइनिंग चेयर, लाउंज चेयर, लो स्टूल और क्यूब स्टूल जैसी कई दुर्लभ वस्तुएं शामिल हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी अनुमानित कीमत लाखों रुपये आंकी गई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि चंडीगढ़ की विरासत को विदेशी संग्रहकर्ताओं के बीच विशेष महत्व प्राप्त है।

विरासत संरक्षण व्यवस्था पर उठे सवाल

अजय जग्गा ने कहा कि बार-बार विदेशों में चंडीगढ़ से जुड़े फर्नीचर और अन्य धरोहर वस्तुओं का सामने आना चिंता का विषय है। इससे यह संकेत मिलता है कि सार्वजनिक संस्थानों में मौजूद ऐतिहासिक संपत्तियों के रिकॉर्ड, संरक्षण और निगरानी व्यवस्था में कहीं न कहीं गंभीर कमियां हैं। उन्होंने मांग की कि ऐसे सभी विरासत आइटम्स की विस्तृत सूची तैयार कर उन्हें डिजिटल रूप से दस्तावेजीकृत किया जाए ताकि उनकी आवाजाही और स्थिति पर नजर रखी जा सके।

दूतावासों और सांस्कृतिक संस्थाओं को सक्रिय करने की मांग

पत्र में सुझाव दिया गया है कि विदेश मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) तथा विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों के बीच एक समन्वित तंत्र विकसित किया जाए। इससे दुनिया भर में होने वाली नीलामियों की निगरानी की जा सकेगी और भारतीय विरासत से जुड़ी वस्तुओं की पहचान कर उनकी वापसी के प्रयास तेज किए जा सकेंगे।

जग्गा ने कहा कि कई देशों ने अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को वापस लाने के लिए विशेष अभियान चलाए हैं। भारत को भी अपनी ऐतिहासिक और कलात्मक संपदा की सुरक्षा के लिए इसी प्रकार की प्रभावी नीति अपनाने की आवश्यकता है।

‘विरासत संरक्षण’ राष्ट्रीय जिम्मेदारी

उन्होंने संविधान के अनुच्छेद-49 का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों, कलाकृतियों और ऐतिहासिक वस्तुओं की सुरक्षा राज्य का दायित्व है। वहीं नागरिकों का भी कर्तव्य है कि वे देश की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने में सहयोग करें।

उनका कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए ‘विकसित भी, विरासत भी’ के विजन को सफल बनाने के लिए ऐसी धरोहरों की रक्षा अत्यंत आवश्यक है। यदि विरासत वस्तुओं की विदेशों में बिक्री का सिलसिला नहीं रुका तो आने वाली पीढ़ियां देश के इतिहास और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े महत्वपूर्ण प्रतीकों से वंचित हो सकती हैं।

फिलहाल इस मुद्दे पर केंद्र सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन विरासत संरक्षण से जुड़े संगठनों और विशेषज्ञों की नजर अब अमेरिका में होने वाली इस नीलामी और उस पर भारत सरकार की संभावित कार्रवाई पर टिकी हुई है।