एक परिवार की 3 पीढ़ियां बॉक्सिंग चैंपियन:दादा और पिता के बाद बेटी 5वीं बार नेशनल चैंपियन बनीं; बोलीं- मां-बाप के हिसाब से चलें

एक परिवार की 3 पीढ़ियां बॉक्सिंग चैंपियन:दादा और पिता के बाद बेटी 5वीं बार नेशनल चैंपियन बनीं; बोलीं- मां-बाप के हिसाब से चलें

हरियाणा के जिला भिवानी में एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों ने बॉक्सिंग को इंटरनेशनल चैंपियन दिए हैं। भिवानी में बॉक्सिंग की शुरुआत करने वाले व बॉक्सिंग के लिए भिवानी को प्रसिद्ध करने वाले कैप्टन हवा सिंह की पोती 5वीं बार नेशनल चैंपियन बनी हैं। नुपुर ने 21 से 27 मार्च तक नोएडा में हुई चैंपियनशिप में 81 प्लस कैटेगरी में मुकाबला खेला था। बता दें कि कैप्टन हवा सिंह ने 1966 व 1970 में दो बार एशियन खेलों में गोल्ड मेडल जीते थे। साल 1961 से 1972 तक उन्होंने लगातार 11 बार हैवीवेट वर्ग में राष्ट्रीय चैंपियनशिप जीती। उन्होंने बॉक्सिंग छोड़ने के बाद कई बॉक्सर तैयार किए। वहीं कैप्टन हवासिंह को अर्जुन अवॉर्ड व द्रोणाचार्य अवॉर्ड भी मिले हैं। कैप्टन हवासिंह के बेटे संजय श्योराण भी इंटरनेशनल चैंपियन रह चुके हैं। उन्होंने एशियन खेलों में मेडल जीता था। सरकार ने उन्हें भीम अवॉर्ड से सम्मानित भी किया है। फिलहाल वे गुरु द्रोणाचार्य कैप्टन हवा सिंह बॉक्सिंग अकादमी में कोचिंग दे रहे हैं। वहीं संजय श्योराण की पत्नी मुकेश रानी भी बास्केटबॉल की खिलाड़ी रही हैं और एशियाई चैंपियनशिप में पदक विजेता हैं। संजय श्योराण के 2 बच्चे हैं। जिनमें बड़ी बेटी नूपुर श्योराण बॉक्सिंग के साथ-साथ पढ़ाई कर रही हैं। वह अब UPSC की भी तैयारी कर रही हैं। पहले वह वर्ल्ड चैंपियनशिप 2023 में भी खेलीं, लेकिन 5वें नंबर पर रहीं। नुपुर श्योराण बोलीं- बॉक्सिंग हारी तो असली रगड़ा-पट्‌टी शुरू हुई
सवाल: नोएडा में आयोजित 8वीं नेशनल महिला बॉक्सिंग चैंपियनशिप का अनुभव कैसा रहा?
नूपुर: कंपीटिशन काफी अच्छा रहा। इसका अनुभव भी काफी अच्छा रहा। 5वीं बार नेशनल चैंपियन बनी हूं। काफी अच्छा लग रहा है। सवाल: क्या खास सीखने को मिला और आगे का क्या लक्ष्य है?
नूपुर: हर बार अनुभव अलग-अलग होते हैं। किसी में कुछ तो किसी में कुछ सीखने को मिलता है। अनुभव तो मिलता ही है। अबकी बार मेरा गेम अलग था। गेम स्ट्रेटजी भी चेंज होती है। आगे का प्लान सितंबर में इंग्लैंड में होने वाली वर्ल्ड चैंपियनशिप है। सवाल: वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए क्या तैयारी है, कितना टाइम अभ्यास कर रही हैं?
नूपुर: सुबह और शाम को ढाई-ढाई घंटे प्रैक्टिस होती है। डाइट का भी ध्यान रखना पड़ता है। सवाल: यहां तक पहुंचने से कितने समय पहले शुरुआत की थी और पढ़ाई में कैसी थी?
नूपुर: पढ़ाई में मैं काफी अच्छी थी। 12वीं में 92 प्रतिशत अंक थे। बॉक्सिंग साढ़े 7 साल पहले शुरू की थी। शुरुआत में खेलते हुए जब पहली बार वे स्टेट चैंपियन बनी तो वे बड़ी आसानी से जीत गई थी। मैं लंबी थी और पंच मारती थी तो दूसरी दब जाती थी। उस समय लगा कि यह बड़ा आसान सा खेल है। बस दूसरे को मारना है। बॉक्सर नुपुर श्योराण ने कहा- पहली बार ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी गेम में हारी। तब पता चला कि असली गेम क्या है। तब पापा ने पूछा कि बेटा तेरे को बॉक्सिंग करनी है। इस पर मैंने हामी भरी तो असली रगड़ा-पट्‌टी स्टार्ट हुई। सवाल: लड़कियों को लाइफ गोल सेट करने के बारे में क्या कहेंगी?
नूपुर: लड़कियों के लिए तो यही कहूंगी कि जो मां-बाप कह रहे हैं, उसके हिसाब से चलो। आज के सब मां-बाप चाहते हैं कि उनके बच्चे आगे बढ़ें। खासकर बेटियां आगे बढ़ें। अपने कोच का कहा मानो। सोसाइटी का प्रेशर कम-से-कम लो। जो भी काम या खेल हो, उसे मजे से करो। पिता बोले- बेटी लाडली, कोचिंग की सख्ती पर दिल जलता है
इस बारे में नुपुर के पिता ने कहा- आगे वर्ल्ड चैंपियनशिप है, उस पर ध्यान दे रहे हैं। परिवार के लोगों के खेल से जुड़े होने पर संजय श्योराण ने कहा- यह तो है कि जैनेटिक असर होता है। दादा कैप्टन हवा सिंह 2 बार एशियन गोल्ड मेडलिस्ट थे। मुझ पर भी काफी दबाव था। अब मैं भी खिलाड़ी हूं तो बेटी पर दबाव ज्यादा होता है। हमारी कोशिश है कि इस बार वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल आए। हम यही कहते हैं कि हार मत मानना। चोट लगे, रिंग में हार गए तो भी पॉजिटिव रहना चाहिए। खुद के बच्चे को ट्रेनिंग देना मुश्किल काम है। बेटी पापा की लाडली होती है और बिना सख्ती के कोई खिलाड़ी नहीं बनता। जब सख्ती होती है तो बापू का दिल तो जलता है। हरियाणा के जिला भिवानी में एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों ने बॉक्सिंग को इंटरनेशनल चैंपियन दिए हैं। भिवानी में बॉक्सिंग की शुरुआत करने वाले व बॉक्सिंग के लिए भिवानी को प्रसिद्ध करने वाले कैप्टन हवा सिंह की पोती 5वीं बार नेशनल चैंपियन बनी हैं। नुपुर ने 21 से 27 मार्च तक नोएडा में हुई चैंपियनशिप में 81 प्लस कैटेगरी में मुकाबला खेला था। बता दें कि कैप्टन हवा सिंह ने 1966 व 1970 में दो बार एशियन खेलों में गोल्ड मेडल जीते थे। साल 1961 से 1972 तक उन्होंने लगातार 11 बार हैवीवेट वर्ग में राष्ट्रीय चैंपियनशिप जीती। उन्होंने बॉक्सिंग छोड़ने के बाद कई बॉक्सर तैयार किए। वहीं कैप्टन हवासिंह को अर्जुन अवॉर्ड व द्रोणाचार्य अवॉर्ड भी मिले हैं। कैप्टन हवासिंह के बेटे संजय श्योराण भी इंटरनेशनल चैंपियन रह चुके हैं। उन्होंने एशियन खेलों में मेडल जीता था। सरकार ने उन्हें भीम अवॉर्ड से सम्मानित भी किया है। फिलहाल वे गुरु द्रोणाचार्य कैप्टन हवा सिंह बॉक्सिंग अकादमी में कोचिंग दे रहे हैं। वहीं संजय श्योराण की पत्नी मुकेश रानी भी बास्केटबॉल की खिलाड़ी रही हैं और एशियाई चैंपियनशिप में पदक विजेता हैं। संजय श्योराण के 2 बच्चे हैं। जिनमें बड़ी बेटी नूपुर श्योराण बॉक्सिंग के साथ-साथ पढ़ाई कर रही हैं। वह अब UPSC की भी तैयारी कर रही हैं। पहले वह वर्ल्ड चैंपियनशिप 2023 में भी खेलीं, लेकिन 5वें नंबर पर रहीं। नुपुर श्योराण बोलीं- बॉक्सिंग हारी तो असली रगड़ा-पट्‌टी शुरू हुई
सवाल: नोएडा में आयोजित 8वीं नेशनल महिला बॉक्सिंग चैंपियनशिप का अनुभव कैसा रहा?
नूपुर: कंपीटिशन काफी अच्छा रहा। इसका अनुभव भी काफी अच्छा रहा। 5वीं बार नेशनल चैंपियन बनी हूं। काफी अच्छा लग रहा है। सवाल: क्या खास सीखने को मिला और आगे का क्या लक्ष्य है?
नूपुर: हर बार अनुभव अलग-अलग होते हैं। किसी में कुछ तो किसी में कुछ सीखने को मिलता है। अनुभव तो मिलता ही है। अबकी बार मेरा गेम अलग था। गेम स्ट्रेटजी भी चेंज होती है। आगे का प्लान सितंबर में इंग्लैंड में होने वाली वर्ल्ड चैंपियनशिप है। सवाल: वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए क्या तैयारी है, कितना टाइम अभ्यास कर रही हैं?
नूपुर: सुबह और शाम को ढाई-ढाई घंटे प्रैक्टिस होती है। डाइट का भी ध्यान रखना पड़ता है। सवाल: यहां तक पहुंचने से कितने समय पहले शुरुआत की थी और पढ़ाई में कैसी थी?
नूपुर: पढ़ाई में मैं काफी अच्छी थी। 12वीं में 92 प्रतिशत अंक थे। बॉक्सिंग साढ़े 7 साल पहले शुरू की थी। शुरुआत में खेलते हुए जब पहली बार वे स्टेट चैंपियन बनी तो वे बड़ी आसानी से जीत गई थी। मैं लंबी थी और पंच मारती थी तो दूसरी दब जाती थी। उस समय लगा कि यह बड़ा आसान सा खेल है। बस दूसरे को मारना है। बॉक्सर नुपुर श्योराण ने कहा- पहली बार ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी गेम में हारी। तब पता चला कि असली गेम क्या है। तब पापा ने पूछा कि बेटा तेरे को बॉक्सिंग करनी है। इस पर मैंने हामी भरी तो असली रगड़ा-पट्‌टी स्टार्ट हुई। सवाल: लड़कियों को लाइफ गोल सेट करने के बारे में क्या कहेंगी?
नूपुर: लड़कियों के लिए तो यही कहूंगी कि जो मां-बाप कह रहे हैं, उसके हिसाब से चलो। आज के सब मां-बाप चाहते हैं कि उनके बच्चे आगे बढ़ें। खासकर बेटियां आगे बढ़ें। अपने कोच का कहा मानो। सोसाइटी का प्रेशर कम-से-कम लो। जो भी काम या खेल हो, उसे मजे से करो। पिता बोले- बेटी लाडली, कोचिंग की सख्ती पर दिल जलता है
इस बारे में नुपुर के पिता ने कहा- आगे वर्ल्ड चैंपियनशिप है, उस पर ध्यान दे रहे हैं। परिवार के लोगों के खेल से जुड़े होने पर संजय श्योराण ने कहा- यह तो है कि जैनेटिक असर होता है। दादा कैप्टन हवा सिंह 2 बार एशियन गोल्ड मेडलिस्ट थे। मुझ पर भी काफी दबाव था। अब मैं भी खिलाड़ी हूं तो बेटी पर दबाव ज्यादा होता है। हमारी कोशिश है कि इस बार वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल आए। हम यही कहते हैं कि हार मत मानना। चोट लगे, रिंग में हार गए तो भी पॉजिटिव रहना चाहिए। खुद के बच्चे को ट्रेनिंग देना मुश्किल काम है। बेटी पापा की लाडली होती है और बिना सख्ती के कोई खिलाड़ी नहीं बनता। जब सख्ती होती है तो बापू का दिल तो जलता है।   हरियाणा | दैनिक भास्कर