‘पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की सान विचारों की धार पर तेज होती है।’ भगत सिंह के ये शब्द उनके विचारों की परिपक्वता और क्रांति के प्रति उनकी स्पष्ट दृष्टि को दर्शाते हैं। वह केवल एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, बल्कि विचारधारा के प्रतीक थे। उनकी शहादत को 93 साल बीत चुके हैं, लेकिन उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। सहारनपुर में रहने वाले सरदार भगत सिंह के भतीजे किरणजीत सिंह संधू उनके पत्रों और स्मृतियों को संजोकर रखे हैं। उनकी आंखों में गर्व और मार्मिकता के मिश्रित भाव झलकते हैं। जब वे कहते हैं, भगत सिंह ने जेल में रहते हुए सैकड़ों किताबें पढ़ीं। द्वारकादास लाइब्रेरी से पुस्तकें मंगवाई और क्रांति को विचारों के माध्यम से नई दिशा देने की कोशिश की। उनकी आखिरी चिट्ठी मेरे पिता, कुलतार सिंह के नाम थी। देश में चल रहे माहौल पर किरणजीत सिंह संधू कहते हैं कि ये गलत है। सब लोग यहां के रहने वाले हैं। यदि भगत सिंह फांसी पर चढ़े हैं तो अशफाक उल्लाह खान, राम प्रसाद बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद ने भी देश को आजाद कराने में अपनी जान की आहूति दी है। ये सभी की मिले जुले प्रयासों का फल है, जो हमें आजादी मिली। इसे हमें खोना नहीं चाहिए। बाहरी ताकतें हमारे खिलाफ है। अजीज कुलतार, तुम्हारे आंसू मुझसे सहन नहीं होते
बताया- भगत सिंह को फांसी की सजा हो चुकी थी। 3 मार्च 1931, लाहौर सेंट्रल जेल में परिवार अंतिम मुलाकात के लिए पहुंचा। 12 वर्षीय कुलतार सिंह ने अपने बड़े भाई को गले लगाया और रो पड़े। भगत सिंह ने हल्की मुस्कान के साथ उसकी पीठ थपथपाई। फिर फांसी से एक दिन पहले 22 मार्च 1931 को भगत सिंह ने आखिरी चिट्ठी भाई और दोस्तों के नाम लिखी। भाई को चिट्ठी लिखकर कहा- “बरखुर्दार, हिम्मत से शिक्षा प्राप्त करना और सेहत का ख्याल रखना। हौसला रखना और क्या कहूं…। उनकी लिखी चिट्ठियों में यह साफ झलकता है कि वे अपनी फांसी को लेकर पूरी तरह से तैयार थे। उन्होंने अपने साथियों को लिखा- अगर फांसी से बच गया तो क्रांति की लौ मंद पड़ जाएगी, लेकिन अगर मैं दिलेरी से फांसी पर चढ़ा, तो यह बलिदान अगली पीढ़ियों को प्रेरित करेगा। किरणजीत सिंह संधू कहते हैं कि भगत सिंह ने अपने जीवन में सिर्फ संघर्ष नहीं किया, बल्कि विचारधारा को क्रांति का हथियार बनाया। उनके पत्र बताते हैं कि वे साम्राज्यवाद के खिलाफ सिर्फ बंदूक से नहीं, बल्कि कलम से भी लड़ रहे थे।उन्होंने अपने पिता सरदार किशन सिंह को पत्र लिखकर साफ कहा- अगर मेरे लिए दया याचिका डाली गई, तो यह क्रांति के लिए सबसे बड़ा अपमान होगा। पंजाब के गवर्नर को गोली से उड़ाने का लिखा पत्र
इतना ही नहीं, उन्होंने गवर्नर पंजाब को एक चिट्ठी लिखकर फांसी के बजाय गोली से उड़ाने की मांग की थी। संधू बताते हैं- उनके साथियों का सरदार भगत सिंह पर दबाव था कि वो मर्सी पिटिशन डाले। तब उन्होंने पंजाब के गवर्नर को लिखा था- हम पर ये आरोप है कि हमने ब्रिटिश राजा के खिलाफ युद्ध किया है। इस नाते से हम युद्ध बंदी है, तो हमें बजाय फांसी देने के ब्रिटिश दस्ता भेजकर गोलियों से उड़ाया जाए। हम ये प्रार्थना करते हैं। तब साथियों ने कहां कि ये आपने क्या किया? किरणजीत सिंह संधू बताते हैं- तब भगत सिंह ने उनसे कहा कि मेरा जीवन इतना महत्वपूर्ण नहीं है। जो मैं अपने आदर्शों की बलि दे दूं। सिद्धांतों से समझौता करके उसे बचाने की बात करूं। एक सच्चा क्रांतिकारी वहीं है, जो हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दें। 23 मार्च 1931 को जब तीन जिंदगियों ने हंसते-हंसते मौत को गले लगाया। फांसी का समय तय शाम 7:30 बजे था। लेकिन अंग्रेज डर गए। उन्होंने तीन घंटे पहले ही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर लटका दिया। जब जल्लाद ने भगत सिंह से उनकी अंतिम इच्छा पूछी, तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा- ब्रिटिश साम्राज्य को खत्म होते देखने की ख्वाहिश थी, लेकिन अब मौत ही मेरी आखिरी ख्वाहिश है। किरणजीत सिंह संधू कहते हैं, भगत सिंह कोई साधारण क्रांतिकारी नहीं थे। ‘शहीद-ए-आजम’ का खिताब उन्हें सत्ता ने नहीं, बल्कि उनके बलिदान ने दिया। क्या हमने भगत सिंह को सिर्फ श्रद्धांजलि तक सीमित कर दिया? आज जब हम 23 मार्च को शहीद दिवस के रूप में याद करते हैं, तो हमें यह भी सोचना चाहिए- क्या हम उनके विचारों को केवल भाषणों और श्रद्धांजलि तक सीमित कर रहे हैं? भगत सिंह ने सिर्फ ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ नहीं, बल्कि शोषण, असमानता और अन्याय के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी। उनके विचारों को आत्मसात करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। ‘पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की सान विचारों की धार पर तेज होती है।’ भगत सिंह के ये शब्द उनके विचारों की परिपक्वता और क्रांति के प्रति उनकी स्पष्ट दृष्टि को दर्शाते हैं। वह केवल एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, बल्कि विचारधारा के प्रतीक थे। उनकी शहादत को 93 साल बीत चुके हैं, लेकिन उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। सहारनपुर में रहने वाले सरदार भगत सिंह के भतीजे किरणजीत सिंह संधू उनके पत्रों और स्मृतियों को संजोकर रखे हैं। उनकी आंखों में गर्व और मार्मिकता के मिश्रित भाव झलकते हैं। जब वे कहते हैं, भगत सिंह ने जेल में रहते हुए सैकड़ों किताबें पढ़ीं। द्वारकादास लाइब्रेरी से पुस्तकें मंगवाई और क्रांति को विचारों के माध्यम से नई दिशा देने की कोशिश की। उनकी आखिरी चिट्ठी मेरे पिता, कुलतार सिंह के नाम थी। देश में चल रहे माहौल पर किरणजीत सिंह संधू कहते हैं कि ये गलत है। सब लोग यहां के रहने वाले हैं। यदि भगत सिंह फांसी पर चढ़े हैं तो अशफाक उल्लाह खान, राम प्रसाद बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद ने भी देश को आजाद कराने में अपनी जान की आहूति दी है। ये सभी की मिले जुले प्रयासों का फल है, जो हमें आजादी मिली। इसे हमें खोना नहीं चाहिए। बाहरी ताकतें हमारे खिलाफ है। अजीज कुलतार, तुम्हारे आंसू मुझसे सहन नहीं होते
बताया- भगत सिंह को फांसी की सजा हो चुकी थी। 3 मार्च 1931, लाहौर सेंट्रल जेल में परिवार अंतिम मुलाकात के लिए पहुंचा। 12 वर्षीय कुलतार सिंह ने अपने बड़े भाई को गले लगाया और रो पड़े। भगत सिंह ने हल्की मुस्कान के साथ उसकी पीठ थपथपाई। फिर फांसी से एक दिन पहले 22 मार्च 1931 को भगत सिंह ने आखिरी चिट्ठी भाई और दोस्तों के नाम लिखी। भाई को चिट्ठी लिखकर कहा- “बरखुर्दार, हिम्मत से शिक्षा प्राप्त करना और सेहत का ख्याल रखना। हौसला रखना और क्या कहूं…। उनकी लिखी चिट्ठियों में यह साफ झलकता है कि वे अपनी फांसी को लेकर पूरी तरह से तैयार थे। उन्होंने अपने साथियों को लिखा- अगर फांसी से बच गया तो क्रांति की लौ मंद पड़ जाएगी, लेकिन अगर मैं दिलेरी से फांसी पर चढ़ा, तो यह बलिदान अगली पीढ़ियों को प्रेरित करेगा। किरणजीत सिंह संधू कहते हैं कि भगत सिंह ने अपने जीवन में सिर्फ संघर्ष नहीं किया, बल्कि विचारधारा को क्रांति का हथियार बनाया। उनके पत्र बताते हैं कि वे साम्राज्यवाद के खिलाफ सिर्फ बंदूक से नहीं, बल्कि कलम से भी लड़ रहे थे।उन्होंने अपने पिता सरदार किशन सिंह को पत्र लिखकर साफ कहा- अगर मेरे लिए दया याचिका डाली गई, तो यह क्रांति के लिए सबसे बड़ा अपमान होगा। पंजाब के गवर्नर को गोली से उड़ाने का लिखा पत्र
इतना ही नहीं, उन्होंने गवर्नर पंजाब को एक चिट्ठी लिखकर फांसी के बजाय गोली से उड़ाने की मांग की थी। संधू बताते हैं- उनके साथियों का सरदार भगत सिंह पर दबाव था कि वो मर्सी पिटिशन डाले। तब उन्होंने पंजाब के गवर्नर को लिखा था- हम पर ये आरोप है कि हमने ब्रिटिश राजा के खिलाफ युद्ध किया है। इस नाते से हम युद्ध बंदी है, तो हमें बजाय फांसी देने के ब्रिटिश दस्ता भेजकर गोलियों से उड़ाया जाए। हम ये प्रार्थना करते हैं। तब साथियों ने कहां कि ये आपने क्या किया? किरणजीत सिंह संधू बताते हैं- तब भगत सिंह ने उनसे कहा कि मेरा जीवन इतना महत्वपूर्ण नहीं है। जो मैं अपने आदर्शों की बलि दे दूं। सिद्धांतों से समझौता करके उसे बचाने की बात करूं। एक सच्चा क्रांतिकारी वहीं है, जो हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दें। 23 मार्च 1931 को जब तीन जिंदगियों ने हंसते-हंसते मौत को गले लगाया। फांसी का समय तय शाम 7:30 बजे था। लेकिन अंग्रेज डर गए। उन्होंने तीन घंटे पहले ही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर लटका दिया। जब जल्लाद ने भगत सिंह से उनकी अंतिम इच्छा पूछी, तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा- ब्रिटिश साम्राज्य को खत्म होते देखने की ख्वाहिश थी, लेकिन अब मौत ही मेरी आखिरी ख्वाहिश है। किरणजीत सिंह संधू कहते हैं, भगत सिंह कोई साधारण क्रांतिकारी नहीं थे। ‘शहीद-ए-आजम’ का खिताब उन्हें सत्ता ने नहीं, बल्कि उनके बलिदान ने दिया। क्या हमने भगत सिंह को सिर्फ श्रद्धांजलि तक सीमित कर दिया? आज जब हम 23 मार्च को शहीद दिवस के रूप में याद करते हैं, तो हमें यह भी सोचना चाहिए- क्या हम उनके विचारों को केवल भाषणों और श्रद्धांजलि तक सीमित कर रहे हैं? भगत सिंह ने सिर्फ ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ नहीं, बल्कि शोषण, असमानता और अन्याय के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी। उनके विचारों को आत्मसात करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उत्तरप्रदेश | दैनिक भास्कर
सरदार भगत सिंह की छोटे भाई के नाम आखिरी चिट्ठी:लिखा- हिम्मत से पढ़ना और सेहत का ख्याल रखना, मेरा बलिदान अगली पीढ़ियों को प्रेरित करेगा
