हक्कानी के सिर से हटा एक करोड़ अमेरिकी डॉलर इनाम:तालिबान से बात करने को क्यों मजबूर पाकिस्तान, रूस, चीन और अमेरिका?

हक्कानी के सिर से हटा एक करोड़ अमेरिकी डॉलर इनाम:तालिबान से बात करने को क्यों मजबूर पाकिस्तान, रूस, चीन और अमेरिका?

अफगान तालिबान ने पिछले हफ्ते अमेरिका के साथ एक समझौता करके अपने विरोधियों को चौंका दिया। उन्होंने दो साल से हिरासत में रखे गए एक अमेरिकी नागरिक जॉर्ज ग्लेजमैन को रिहा कर दिया और इसके बदले में अमेरिकी सरकार ने अफगानिस्तान के गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी के सिर पर रखे गए एक करोड़ डॉलर के इनाम को हटा लिया। इस समझौते को सफल बनाने में कतर सरकार ने अहम भूमिका निभाई। ग्लेजमैन 2025 में अफगानिस्तान से रिहा होने वाले तीसरे अमेरिकी नागरिक हैं। इससे पहले, जनवरी में रयान कॉर्बेट और विलियम मैकेंटी को कैदियों की अदला-बदल के तहत रिहा किया गया था। अफगान तालिबान ने पिछले हफ्ते पाकिस्तान के साथ भी बातचीत की, जिसके बाद तोरखम सीमा को आखिरकार खोल दिया गया जो पिछले करीब एक माह से बंद थी। दिलचस्प बात यह है कि चीन ने पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच तनाव कम करने में अहम भूमिका निभाई। चीन ने अफगान तालिबान के साथ पहली बार दो साल पहले एक समझौता किया था। सितंबर 2023 में चीन ने अफगानिस्तान में अपना राजदूत नियुक्त किया। चीनी कंपनियों ने काबुल में अपने कार्यालय खोल लिए हैं और उन्होंने अफगानिस्तान में कई परियोजनाएं भी शुरू कर दी हैं। आखिर अफगान तालिबान और चीन के साझा हित क्या हैं? दोनों ही इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड अल-शाम (आईएसआईएस) के खिलाफ लड़ रहे हैं, जो इस क्षेत्र में इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान प्रोविंस (आईएसकेपी) के नाम से सक्रिय है। इससे पहले अफगान तालिबान चीन के शिंजियांग सूबे के मुस्लिम उग्रवादियों को शरण दे रहा था। जब चीन को पता चला कि चीनी उइगुरों ने अफगानिस्तान के बदख्शान सूबे में एक प्रशिक्षण शिविर खोल लिया है तो उन्होंने तालिबान के साथ संपर्क किया और उन्हें इस शिविर को बंद करने के बदले में भारी आर्थिक लाभ देने की पेशकश की। अफगान तालिबान ने इस शिविर को तुरंत बंद कर दिया। नाराज उइगुर आईएसकेपी में शामिल हो गए। अफगानिस्तान में चीन के बढ़ते प्रभाव ने रूस, उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान को भी आईएसआईएस के खिलाफ तालिबान से मदद मांगने के लिए प्रेरित किया है। भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री की हाल ही में यूएई में अफगान विदेश मंत्री के साथ हालिया बैठक भी बहुत अहम मानी जा रही है, क्योंकि आईएसआईएस भारत में भी ‘इस्लामिक स्टेट-हिंद प्रोविंस’ (ISHP) के नाम से सक्रिय है। हिंद प्रोविंस के प्रमुख हारिस फारूकी को पिछले साल तब गिरफ्तार किया गया था, जब वह बांग्लादेश के रास्ते भारत में घुसने की कोशिश कर रहा था। ‘इस्लामिक स्टेट-हिंद प्रोविंस’ की स्थापना अफगानिस्तान में हुई थी और फिर इसके कुछ सदस्य बांग्लादेश में शिफ्ट हो गए। अफगान तालिबान ने भारत को हिंद प्रोविंस के खिलाफ सहयोग करने का भरोसा दिलाया है। तालिबान द्वारा 2020 में दोहा में अमेरिका के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद अफगानिस्तान और पाकिस्तान के चरमपंथियों के बीच इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान प्रोविंस (आईएसकेपी) काफी मशहूर हो गया। आईएसकेपी ने अफगान तालिबान पर हमले करने शुरू कर दिए और पाकिस्तान में तालिबान समर्थकों को भी निशाना बनाया। उसने न केवल अफगानिस्तान और पाकिस्तान में, बल्कि भारत, ईरान और कई मध्य एशियाई देशों में भी ऑनलाइन भर्ती अभियान शुरू कर दिया। पाकिस्तान ने कुछ हफ्ते पहले बलूचिस्तान सूबे से एक आईएसकेपी आतंकवादी को गिरफ्तार कर उसे अमेरिका को सौंप दिया था। यह अफगान आतंकी अगस्त 2021 में काबुल हवाई अड्डे पर 15 अमेरिकी सैनिकों की हत्या में शामिल था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मदद के लिए पाकिस्तान की तारीफ भी की थी। दरअसल, आईएसकेपी ने अफगान तालिबान की रणनीतिक स्थिति को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत किया है और न केवल चीन, पाकिस्तान और भारत बल्कि अमेरिका को भी तालिबान के साथ गुप्त वार्ता करने के लिए मजबूर कर दिया है। आईएसआईएस का कमांड और कंट्रोल सेंटर सीरिया में स्थित है। यह वैश्विक आतंकवादी संगठन यूरोप और अमेरिका के असंतुष्ट और भटके हुए मुस्लिम युवाओं को अपने साथ जोड़ने में सफल रहा। दूसरे शब्दों में, हाल के वर्षों में आईएसआईएस ने अल-कायदा की जगह ले ली है और यही वजह है कि अमेरिका को भी अफगान तालिबान के साथ एक अघोषित गठबंधन बनाने की जरूरत पड़ रही है। पाकिस्तान ने हाल ही में 31 मार्च तक सभी अफगान शरणार्थियों को देश से बाहर निकालने की घोषणा की थी। हाल ही में पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच बातचीत के दौरान इस तारीख को बढ़ाकर 30 जून कर दिया गया है। इसके बदले में अफगान तालिबान पाकिस्तान को तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और बलूच लिबरेशन आर्मी की सीमा पार गतिविधियों को नियंत्रित करने में सहयोग करेगा। दोनों देश मिलकर आईएसकेपी के खिलाफ लड़ाई लड़ेंगे।
पाकिस्तान, चीन, भारत और अमेरिका के साथ इन समझौतों की सफलता इन सभी देशों और संयुक्त राष्ट्र को अफगान तालिबान को अफगानिस्तान की वैध सरकार के रूप में मान्यता देने के लिए मजबूर कर सकती है। —————— ये कॉलम भी पढ़ें… एक महीने से क्यों बंद है पाक-अफगान सरहद?:पाकिस्तानी सरकार का फरमान सभी अफगान नागरिक देश छोड़ दें, नहीं तो 1 अप्रैल से जबरन निकालेंगे अफगान तालिबान ने पिछले हफ्ते अमेरिका के साथ एक समझौता करके अपने विरोधियों को चौंका दिया। उन्होंने दो साल से हिरासत में रखे गए एक अमेरिकी नागरिक जॉर्ज ग्लेजमैन को रिहा कर दिया और इसके बदले में अमेरिकी सरकार ने अफगानिस्तान के गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी के सिर पर रखे गए एक करोड़ डॉलर के इनाम को हटा लिया। इस समझौते को सफल बनाने में कतर सरकार ने अहम भूमिका निभाई। ग्लेजमैन 2025 में अफगानिस्तान से रिहा होने वाले तीसरे अमेरिकी नागरिक हैं। इससे पहले, जनवरी में रयान कॉर्बेट और विलियम मैकेंटी को कैदियों की अदला-बदल के तहत रिहा किया गया था। अफगान तालिबान ने पिछले हफ्ते पाकिस्तान के साथ भी बातचीत की, जिसके बाद तोरखम सीमा को आखिरकार खोल दिया गया जो पिछले करीब एक माह से बंद थी। दिलचस्प बात यह है कि चीन ने पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच तनाव कम करने में अहम भूमिका निभाई। चीन ने अफगान तालिबान के साथ पहली बार दो साल पहले एक समझौता किया था। सितंबर 2023 में चीन ने अफगानिस्तान में अपना राजदूत नियुक्त किया। चीनी कंपनियों ने काबुल में अपने कार्यालय खोल लिए हैं और उन्होंने अफगानिस्तान में कई परियोजनाएं भी शुरू कर दी हैं। आखिर अफगान तालिबान और चीन के साझा हित क्या हैं? दोनों ही इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड अल-शाम (आईएसआईएस) के खिलाफ लड़ रहे हैं, जो इस क्षेत्र में इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान प्रोविंस (आईएसकेपी) के नाम से सक्रिय है। इससे पहले अफगान तालिबान चीन के शिंजियांग सूबे के मुस्लिम उग्रवादियों को शरण दे रहा था। जब चीन को पता चला कि चीनी उइगुरों ने अफगानिस्तान के बदख्शान सूबे में एक प्रशिक्षण शिविर खोल लिया है तो उन्होंने तालिबान के साथ संपर्क किया और उन्हें इस शिविर को बंद करने के बदले में भारी आर्थिक लाभ देने की पेशकश की। अफगान तालिबान ने इस शिविर को तुरंत बंद कर दिया। नाराज उइगुर आईएसकेपी में शामिल हो गए। अफगानिस्तान में चीन के बढ़ते प्रभाव ने रूस, उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान को भी आईएसआईएस के खिलाफ तालिबान से मदद मांगने के लिए प्रेरित किया है। भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री की हाल ही में यूएई में अफगान विदेश मंत्री के साथ हालिया बैठक भी बहुत अहम मानी जा रही है, क्योंकि आईएसआईएस भारत में भी ‘इस्लामिक स्टेट-हिंद प्रोविंस’ (ISHP) के नाम से सक्रिय है। हिंद प्रोविंस के प्रमुख हारिस फारूकी को पिछले साल तब गिरफ्तार किया गया था, जब वह बांग्लादेश के रास्ते भारत में घुसने की कोशिश कर रहा था। ‘इस्लामिक स्टेट-हिंद प्रोविंस’ की स्थापना अफगानिस्तान में हुई थी और फिर इसके कुछ सदस्य बांग्लादेश में शिफ्ट हो गए। अफगान तालिबान ने भारत को हिंद प्रोविंस के खिलाफ सहयोग करने का भरोसा दिलाया है। तालिबान द्वारा 2020 में दोहा में अमेरिका के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद अफगानिस्तान और पाकिस्तान के चरमपंथियों के बीच इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान प्रोविंस (आईएसकेपी) काफी मशहूर हो गया। आईएसकेपी ने अफगान तालिबान पर हमले करने शुरू कर दिए और पाकिस्तान में तालिबान समर्थकों को भी निशाना बनाया। उसने न केवल अफगानिस्तान और पाकिस्तान में, बल्कि भारत, ईरान और कई मध्य एशियाई देशों में भी ऑनलाइन भर्ती अभियान शुरू कर दिया। पाकिस्तान ने कुछ हफ्ते पहले बलूचिस्तान सूबे से एक आईएसकेपी आतंकवादी को गिरफ्तार कर उसे अमेरिका को सौंप दिया था। यह अफगान आतंकी अगस्त 2021 में काबुल हवाई अड्डे पर 15 अमेरिकी सैनिकों की हत्या में शामिल था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मदद के लिए पाकिस्तान की तारीफ भी की थी। दरअसल, आईएसकेपी ने अफगान तालिबान की रणनीतिक स्थिति को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत किया है और न केवल चीन, पाकिस्तान और भारत बल्कि अमेरिका को भी तालिबान के साथ गुप्त वार्ता करने के लिए मजबूर कर दिया है। आईएसआईएस का कमांड और कंट्रोल सेंटर सीरिया में स्थित है। यह वैश्विक आतंकवादी संगठन यूरोप और अमेरिका के असंतुष्ट और भटके हुए मुस्लिम युवाओं को अपने साथ जोड़ने में सफल रहा। दूसरे शब्दों में, हाल के वर्षों में आईएसआईएस ने अल-कायदा की जगह ले ली है और यही वजह है कि अमेरिका को भी अफगान तालिबान के साथ एक अघोषित गठबंधन बनाने की जरूरत पड़ रही है। पाकिस्तान ने हाल ही में 31 मार्च तक सभी अफगान शरणार्थियों को देश से बाहर निकालने की घोषणा की थी। हाल ही में पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच बातचीत के दौरान इस तारीख को बढ़ाकर 30 जून कर दिया गया है। इसके बदले में अफगान तालिबान पाकिस्तान को तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और बलूच लिबरेशन आर्मी की सीमा पार गतिविधियों को नियंत्रित करने में सहयोग करेगा। दोनों देश मिलकर आईएसकेपी के खिलाफ लड़ाई लड़ेंगे।
पाकिस्तान, चीन, भारत और अमेरिका के साथ इन समझौतों की सफलता इन सभी देशों और संयुक्त राष्ट्र को अफगान तालिबान को अफगानिस्तान की वैध सरकार के रूप में मान्यता देने के लिए मजबूर कर सकती है। —————— ये कॉलम भी पढ़ें… एक महीने से क्यों बंद है पाक-अफगान सरहद?:पाकिस्तानी सरकार का फरमान सभी अफगान नागरिक देश छोड़ दें, नहीं तो 1 अप्रैल से जबरन निकालेंगे   उत्तरप्रदेश | दैनिक भास्कर